{"_id":"6a929c2663091e8ff4073aba","slug":"punjab-elections-akali-dal-waris-punjab-de-ramp-up-activity-in-raikot-2026-08-29","type":"story","status":"publish","title_hn":"पंजाब चुनाव: रायकोट में बढ़ी अकाली दल वारिस पंजाब दे की सक्रियता, टकसाली वोट बैंक में सेंध की कोशिश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पंजाब चुनाव: रायकोट में बढ़ी अकाली दल वारिस पंजाब दे की सक्रियता, टकसाली वोट बैंक में सेंध की कोशिश
Sat, 29 Aug 2026 02:15 PM IST
Nivedita
संवाद न्यूज एजेंसी, हलवारा
संवाद न्यूज एजेंसी, हलवारा
Published by: Nivedita
Updated Sat, 29 Aug 2026 02:15 PM IST
सार
रायकोट लंबे समय से टकसाली अकाली सियासत का गढ़ रहा है। दिवंगत जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी का यहां गहरा राजनीतिक प्रभाव था। उनके और उनके बड़े बेटे रंजीत सिंह तलवंडी के निधन के बाद अकाली राजनीति कमजोर हुई। अब रायकोट की टकसाली अकाली राजनीति में नया बिखराव दिख रहा है।
विज्ञापन
अकाली दल वारिस पंजाब दे
- फोटो : संवाद
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मालवा की रायकोट सीट पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। अकाली दल वारिस पंजाब दे ने अभी तक अपना प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। इसके बावजूद पार्टी के हलका इंचार्ज जगरूप सिंह हसनपुर ने गांवों और कस्बों में बैठकें शुरू कर दी हैं।
विज्ञापन
इन बैठकों में पार्टी की गतिविधियों और पंथक मुद्दों पर चर्चा हो रही है। इसका उद्देश्य युवाओं और अकाली परिवारों को पार्टी से जोड़ना है। रायकोट लंबे समय से टकसाली अकाली सियासत का गढ़ रहा है। दिवंगत जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी का यहां गहरा राजनीतिक प्रभाव था।
विज्ञापन
उनके और उनके बड़े बेटे रंजीत सिंह तलवंडी के निधन के बाद अकाली राजनीति कमजोर हुई। अब रायकोट की टकसाली अकाली राजनीति में नया बिखराव दिख रहा है। जगरूप सिंह हसनपुर का दावा है कि युवा वर्ग और अकाली पृष्ठभूमि वाले परिवार वारिस पंजाब दे से जुड़ रहे हैं। पिछले दो विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने रायकोट सीट पर जीत दर्ज की है। कांग्रेस के कामिल अमर सिंह बोपाराय भी यहां सक्रिय हैं।
विज्ञापन
अकाली वोट बैंक में सेंध की कोशिश
रायकोट में कई पुराने अकाली परिवार अब अलग-अलग धड़ों की ओर रुख कर रहे हैं। कुछ अकाली दल पुनर सुरजीत से जुड़े हैं, तो कुछ वारिस पंजाब दे की ओर जा रहे हैं। हसनपुर की बैठकें इसी बदलते राजनीतिक समीकरण से जुड़ी हैं। पार्टी पंथक विचारधारा के सहारे पुराने अकाली समर्थकों को जोड़ने का प्रयास कर रही है।
2027 चुनाव पर संभावित असर
अगर वारिस पंजाब दे पुराने अकाली समर्थकों में पकड़ मजबूत करता है, तो आगामी विधानसभा चुनाव में जीत-हार के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। इससे अकाली दल बादल के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लग सकती है। सरकारी तंत्र भी वारिस पंजाब दे की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रख रहा है। यह देखना होगा कि हसनपुर की सक्रियता 2027 के चुनावी समीकरण को कितना प्रभावित करती है।