पश्चिम बंगाल के माल्दा जिले के बुनकर हफ्तेभर पहले रोजी-रोटी के लिए घर वालों से विदा लेकर कालीननगरी पहुंचे थे। यहां आए उन्हें तीन दिन ही हुए थे कि उनके दुनिया से विदा होने की खबर मिल गई। कौन जानता था कि मौत उन्हें माल्दा से खींच कर कालीन नगरी ले जा रही है। सोमवार को ज्ञानपुर कोतवाली पहुंचे मृत बुनकरों के परिजनों की सिसकियों के साथ यही पीड़ा झलक रही थी। देखें आगे की स्लाइड्स में...
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- फोटो : amar ujala
पश्चिम बंगाल के माल्दा जिले के रहने वाले मृत कलाम के भाई मो. नवीउल ने कहा कि वहां कामकाज नहीं होने से वहां के बुनकरों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। गरीबी के चलते वहां के ज्यादातर कामगार भदोही, प्रतापगढ़, जौनपुर और मिर्जापुर में काम करने के लिए आते हैं।
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रोटहां की घटना में मृत नौ बुनकरों में से पांच दो दिन पहले ही आए थे। 18 और 20 फरवरी को सभी घरवालों से विदा होकर भदोही के लिए निकले थे। वे भदोही कालीन बुनने के लिए आए थे, लेकिन बारूदी विस्फोट ने उनकी जीवन लीला ही समाप्त कर दी। मालूम होता कि मखमली कालीनों के पीछे यहां ऐसा कारोबार होता है तो किसी को भी नहीं भेजते।
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विस्फोट में ढहा मकान
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मृत अब्दुल कलाम के भाई मो. नवीउल और गांव के शाहनवाज अंसारी ने कहा कि सभी की घरवालों से बराबर बातचीत होती थी। लेकिन, उन लोगों ने यह कभी नहीं बताया कि एक ही छत के नीचे दीवार के इस पार कालीन का और उस पार पटाखे का कारोबार होता है। जबकि वहां पटाखे का कारोबार होता है, यह बात यहां के सारे लोगों को पता थी। फिर बुनकर दीवार के उस पार होने वाले बारूद के कारोबार से कैसे अंजान रह सकते थे। इसका जवाब न तो मृतकों के परिजन दे पाए और न ही उनके करीबी।
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मृत अब्दुल कलाम के भाई मो. नवीउल और गांव के शाहनवाज अंसारी से जब क्षत-विक्षत हो चुके शवों को यहीं के किसी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक करने की बात कही गई तो वह फफक पड़े। कहा कि घर वाले अपनों का चेहरा देखना चाहते हैं। अब तो वह दुनिया से रुखसत हो चुके हैं। परिवार वाले उनके शव को ही देखकर संतोष कर लेंगे।