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भदोही विस्फोट: बुनकरों को बंगाल से मौत खींच लाई कालीन नगरी, तीन दिन पहले की आए थें नौकरी की तलाश में

Tue, 26 Feb 2019 09:57 PM IST
Sayali Maurya विद्याशंकर तिवारी,अमर उजाला,भदोही
विद्याशंकर तिवारी,अमर उजाला,भदोही Published by: Sayali Maurya Updated Tue, 26 Feb 2019 09:57 PM IST
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Pashchim Bangal weaver died in Bhadohi blast
bhadohi blast - फोटो : amar ujala

पश्चिम बंगाल के माल्दा जिले के बुनकर हफ्तेभर पहले रोजी-रोटी के लिए घर वालों से विदा लेकर कालीननगरी पहुंचे थे। यहां आए उन्हें तीन दिन ही हुए थे कि उनके दुनिया से विदा होने की खबर मिल गई। कौन जानता था कि मौत उन्हें माल्दा से खींच कर कालीन नगरी ले जा रही है। सोमवार को ज्ञानपुर कोतवाली पहुंचे मृत बुनकरों के परिजनों की सिसकियों के साथ यही पीड़ा झलक रही थी। देखें आगे की स्लाइड्स में...

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Pashchim Bangal weaver died in Bhadohi blast
bhadohi blast - फोटो : amar ujala

पश्चिम बंगाल के माल्दा जिले के रहने वाले मृत कलाम के भाई मो. नवीउल ने कहा कि वहां कामकाज नहीं होने से वहां के बुनकरों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। गरीबी के चलते वहां के ज्यादातर कामगार भदोही, प्रतापगढ़, जौनपुर और मिर्जापुर में काम करने के लिए आते हैं।

Pashchim Bangal weaver died in Bhadohi blast
bhadohi - फोटो : amar ujala

रोटहां की घटना में मृत नौ बुनकरों में से पांच दो दिन पहले ही आए थे। 18 और 20 फरवरी को सभी घरवालों से विदा होकर भदोही के लिए निकले थे। वे भदोही कालीन बुनने के लिए आए थे, लेकिन बारूदी विस्फोट ने उनकी जीवन लीला ही समाप्त कर दी। मालूम होता कि मखमली कालीनों के पीछे यहां ऐसा कारोबार होता है तो किसी को भी नहीं भेजते।

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Pashchim Bangal weaver died in Bhadohi blast
विस्फोट में ढहा मकान - फोटो : amar ujala

मृत अब्दुल कलाम के भाई मो. नवीउल और गांव के शाहनवाज अंसारी ने कहा कि सभी की घरवालों से बराबर बातचीत होती थी। लेकिन, उन लोगों ने यह कभी नहीं बताया कि एक ही छत के नीचे दीवार के इस पार कालीन का और उस पार पटाखे का कारोबार होता है। जबकि वहां पटाखे का कारोबार होता है, यह बात यहां के सारे लोगों को पता थी। फिर बुनकर दीवार के उस पार होने वाले बारूद के कारोबार से कैसे अंजान रह सकते थे। इसका जवाब न तो मृतकों के परिजन दे पाए और न ही उनके करीबी।

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Pashchim Bangal weaver died in Bhadohi blast
bhadohi blast - फोटो : amar ujala

मृत अब्दुल कलाम के भाई मो. नवीउल और गांव के शाहनवाज अंसारी से जब क्षत-विक्षत हो चुके शवों को यहीं के किसी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक करने की बात कही गई तो वह फफक पड़े। कहा कि घर वाले अपनों का चेहरा देखना चाहते हैं। अब तो वह दुनिया से रुखसत हो चुके हैं। परिवार वाले उनके शव को ही देखकर संतोष कर लेंगे।

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