मधुबनी पेंटिंग भारत और विदेशों में सबसे प्रसिद्ध कलाओं में से एक है। मधुबनी कला मिथिलांचल क्षेत्र जैसे बिहार के दरभंगा, मधुबनी और नेपाल के कुछ क्षेत्रों की प्रमुख चित्रकला है। शुरू में रंगोली के रूप में रहने के बाद यह कला धीरे-धीरे आधुनिक रूप में कपड़ों, दीवारों और कागजों पर उतर आई है। तस्वीरें देखें आगे की स्लाइड्स में...
मिथिला की औरतों द्वारा शुरू की गई इस घरेलू चित्रकला का काशी में भी काफी क्रेज है। मिथिला की बेटी वाणी इसके संरक्षण के साथ ही नए हुनर को मंच देने का कार्य कर रही हैं।
वाणी को यह कला सीखने की ललक हमेशा से थी, लेकिन पढ़ाई के लिए बाहर रहने के कारण इस कला को कभी सीख नहीं पाई। मिथिला की वाणी शादी के बाद बनारस आ गई, लेकिन गर्मी की छुट्टियों में मायके जाकर इस कला को सीखना शुरू किया। इसके बाद वाणी ने मिट्टी के घड़े, साड़ी, सूट, वॉल पर चित्रकारी करना शुरू किया। बनारस में हुए मिथिला मिलन समारोह ने उनकी इस कला को पहचान दिलाई।
पिता की मृत्यु के बाद वाणी ने इस कला से अपनी मां और बेटी को भी जोड़ा। इनके द्वारा साड़ी, कुर्ती, दुपट्टा, टाई, वॉल हैंगिंग और सजावटी समानों पर कि गई मधुबनी चित्रकारी बनारस, इलाहाबाद, कर्नाटक, लखनऊ तक पहुंच रहे हैं। इस कला के संरक्षण के उद्देश्य से वाणी ने मार्च 2019 में सखी बहिनपा फाउंडेशन की स्थापना की। जिससे आब तक 16 महिलाएं जुड़ चुकी है।
क्या है मधुबनी कला :
मधुबनी चित्रकारी को मिथिला की कला भी कहा जाता है। इसकी विशेषता चटकीले और विषम रंगों से भरे गए रेखा चित्र या आकृतियां हैं। ये चित्र अपने आदिवासी रूप और चटकीले और मटियाले रंगों के प्रयोग के कारण लोकप्रिय हैं। इसमें खनिज रंजकों का प्रयोग किया जाता है।