वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ:, निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येषु सर्वदा। अर्थात घुमावदार सूंड वाले, विशालकाय शरीर, करोड़ सूर्य के समान महान प्रतिभाशाली। मेरे प्रभु, हमेशा मेरे सारे कार्य बिना विघ्न के पूरे करने की कृपा करें॥
शिव की नगरी काशी में उनके पुत्र और प्रथम पूज्य गणेश के उत्सव की रंगत भक्तों पर नजर आने लगी है। मराठी समाज के अलावा भी घर-घर में भगवान गणेश को विराजमान कराया गया है। तो आइए हम आपको दर्शन कराते हैं काशी के प्रमुख पंच विनायक से...।
बाबा विश्वनाथ से पहले करते हैं ढुंढिराज को प्रणाम
काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रवेश से पहले ढुंढिराज गणेश का मंदिर विराजमान है। बाबा के दर्शन करने आने वाले भक्त सबसे पहले ढुंढिराज को प्रणाम करके आगे बढ़ते हैं। मान्यता है कि भगवान गणेश इस स्वरूप में काशी के कष्टों को भी हरते हैं। जो भक्त निरंतर इनका नाम जपता है, अष्ट सिद्धियां उस व्यक्ति का नाम जपती हैं। उस व्यक्ति को जीवन में समस्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
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त्रिनेत्र प्रतिमा वाला है मंदिर बड़ा गणेश
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त्रिनेत्र प्रतिमा वाला है मंदिर बड़ा गणेश
बड़ा गणेश का स्वयंभू त्रिनेत्र प्रतिमा वाला यह मंदिर लोहटिया में है। मान्यता है कि जब काशी में गंगा मां के साथ मंदाकिनी नदी बहती थी, उस समय भगवान गणेश की यह प्रतिमा मिली थी। यहां पर भगवान गणेश अपनी दोनों पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि और संतानों शुभ-लाभ के साथ विराजमान हैं। मान्यता है कि गणेश जी के इस रूप की उपासना करने से व्यक्ति को ऋद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ की प्राप्ति होती है।
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काले रंग की है कूटदंत की प्रतिमा
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काले रंग की है कूटदंत की प्रतिमा
बाबा कीनाराम आश्रम के प्रांगण में कूटदंत विनायक का मंदिर विराजमान है। वह साक्षात ब्रह्मा के स्वरूप हैं। काशी के 56 विनायकों में यह इकलौते विनायक हैं जिनकी प्रतिमा काले रंग की है। स्कंदपुराण के अनुसार कूटदंत विनायक कठिनाइयों और विपत्तियों का नाश करते हैं। काशी के 56 विनायकों की परिक्रमा करने वाले भक्त इनके दर्शन-पूजन जरूर करते हैं।
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मूंगा गणेश के नाम से जाने जाते हैं अमृत विनायक
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मूंगा गणेश के नाम से जाने जाते हैं अमृत विनायक
गणेश घाट पर विराजमान अमृत विनायक मूंगा गणेश के रूप में पूजे जाते हैं। गणेश जी की मूर्ति 11 जून 1807 में स्थापित की गई थी। जिस आसन पर गणेश जी विराजमान हैं वह एक दुर्लभ संगमरमर से बना हुआ है। मूर्ति के अद्भुत रंग के कारण लोगों का मानना है कि मूर्ति मूंगे से बनी है। पेशवाओं द्वारा स्थापित इस मंदिर के नाम से ही गणेश घाट का नाम भी जाना जाता है।
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दुर्गाकुंड स्थित है दुर्ग विनायक
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दुर्गाकुंड के दक्षिणी कोने में हैं दुर्ग विनायकदुर्ग विनायक का मंदिर दुर्गाकुंड क्षेत्र में है। कुंड के दक्षिण कोने में विराजमान साक्षात दुर्ग विनायक के दर्शन-पूजन से कष्टों का निवारण हो जाता है। ऐसा कहा गया है कि कलयुग में काली और विनायक की पूजा से तत्काल फल प्राप्त हो जाता है। दुर्ग विनायक की मान्यता है कि किसी भी नौकरी, मकान और परियोजना के पहले यहां पूजा करने से उसमें सफलता प्राप्त होना निश्चित है।