पथ में सांझ, पहाड़ियां ऊपर, पीछे अंके झरने का पुकारना। सीकरों की मेहराब की छांव में, छूटे हुए कुछ का ठुनकारना... ये कविता है डॉ. नामवर सिंह की। इस वक्त पूरा साहित्य जगत गमगीन है और रो रहा है। साहित्य जगत ने न सिर्फ एक अच्छा आलोचक खोया है बल्कि एक नेक दिल इंसान को भी खो दिया है। डॉ. नामवर सिंह की एक अंतिम इच्छा अधूरी ही रह गई और उसके पूरा होने से पहले ही वे दुनिया को अलविदा कह दिए। देखें आगे की स्लाइड्स में...
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namvar singh
- फोटो : amar ujala
डॉ. नामवर सिंह पान को बाबा काशी विश्वनाथ का आशीर्वाद और प्रसाद मानते थे, इसी वजह से वो सदैव पान खाते थे और साथ रखते थे। साफ कहते थे कि पान काशी की सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है। डॉ. नामवर सिंह ने जीवन पर्यंत काशी और पूर्वांचल की संस्कृति को जिया और इससे खुद को कभी अलग नहीं होने दिया। काशी और चंदौली की मिट्टी को उन्होंने सदैव मां का दर्जा दिया।
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डॉ. नामवर सिंह कहते थे कि जो कुछ भी हूं अपनी माटी से मिले ज्ञान और अपने पुरखों के नेक कर्मों की बदौलत हूं। हाल ही में एक टीवी समाचार चैनल से बातचीत में डॉ. नामवर सिंह ने कहा था कि अंतिम इच्छा है कि एक बार फिर काशी जाऊं। जीवन के विविध रंगों, प्रगति के नए आयामों को महसूस करना चाहता हूं। अपने लोगों को देखना और उनसे रूबरू होना चाहता हूं। लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।
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डॉ. नामवर सिंह धानापुर ब्लाक के जीयनपुर गांव के निवासी थे। नागर सिंह के तीन पुत्रों में सबसे बड़े डॉ. नामवर सिंह की प्राथमिक शिक्षा कमालपुर में हुई। इसके बाद उच्च शिक्षा बीएचयू से ली। नामवर सिंह, रामजी सिंह और काशीनाथ सिंह तीनों बाहर रहने लगे लेकिन तीनों का गांव वालों से जुड़ाव हमेशा रहा। घर की देखभाल करने वाले 70 वर्षीय जामवंत राजभर ने कहा कि नामवर के पिता नागर सिंह ने बचपन से उन्हें रखा था और सभी भाइयों ने भी उन्हें भाई जैसा प्यार दिया। कहा कि प्रत्येक दशहरा पर तीनों लोग घर आते और डॉ. नामवर सिंह सभी बच्चों को लेकर कमालपुर मेला देखने जाते।
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बड़े आदमी होने के बाद भी उनको गुमान नहीं था। वह आते तो गांव वाले सिर्फ उनकी बातें सुनने आते। तीनों भाई एक साथ बैठते तो नामवर कम बोलते लेकिन उनकी छोटी बात का भी बड़ा अर्थ होता था। उनका भतीजा लाल बहादुर कहते हैं कि बचपन में वह साथ खेलते थे। वे जितना तेज पढ़ाई में थे, उतने ही शातिर कबड्डी, कौड़िया मिसाल खेल में थे। उनसे जीतना मुश्किल था। वे हमारे कक्का थे लेकिन बच्चों के साथ वे बच्चे बन जाते थे। भतीजा महातिम ने कहा कि वह गांव में बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए चिंतित रहते थे।