डॉ. नामवर सिंह के व्यक्तित्व का राजनीतिक पहलू भी है। कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक डॉ. सिंह ने 1959 में चंदौली लोकसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ा था। हालांकि वे तीसरे स्थान पर रहे थे। इसके बाद उनका राजनीति से मोह भंग हो गया। इस चुनाव को नहीं जीत पाना उनकी नौकरी पर भी पड़ गया था। देखें आगे की स्लाइड्स में...
राजनीति से भी रहा डॉ. नामवर सिंह का रिश्ता, चुनाव के चक्कर में गंवानी पड़ी थी नौकरी
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चंदौली के फेसूड़ा गांव निवासी अंबिका सिंह नामवर को याद करते हुए कहते हैं कि पढ़ाई के समय ही उनका झुकाव कम्युनिस्ट विचारधारा की ओर हो गया था। उन्होंने 1959 में कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव चिह्न पर चंदौली लोकसभा सीट से उप चुनाव लड़ा। उन्हें 2400 मत मिले और तीसरे नंबर पर रहे थे। चुनाव में सोशलिस्ट प्रभुनारायन सिंह जीते थे जबकि जगतनरायन दूसरे नंबर पर रहे। बताया, वह चुनाव में गांव-गांव पैदल घूम कर प्रचार करते थे।
आवाजापुर निवासी साहित्यकार एल उमाशंकर सिंह ने कहा कि भले ही इसके बाद उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा लेकिन गांव के विकास के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहे। गांव के प्राथमिक विद्यालय निर्माण के लिए भूमि कम पड़ रही थी तो उन्होंने 15 डिस्मिल भूमि दान कर दी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र निर्माण के लिए एक एकड़ छह डिस्मिल भूमि दान की थी। उनके बुलावे पर 1993, 1995 और 2001 में गांव आए। हर भाषण के दौरान अपनों के बीच भावुक हो जाते और कहते कि घर एक ठगिनी माया है। कम पढ़े तो हल छूटे, ढेर पढ़े तो घर छूटे। देश में रहूंगा, परदेश में रहूंगा, किसी भी वेश में रहूंगा, तब भी आपका ही कहा जाऊंगा।
प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘नामवर की यात्रा’ में उनके चुनाव लड़ने से लेकर हारने के बाद तक की कहानी लिखी है। किताब में लिखा है कि 1959 में बीएचयू के हिंदी विभाग में अस्थायी प्रवक्ता रहते हुए चुनाव लड़ने के कारण नामवर सिंह को अपना पद गंवाना पड़ा था। चुनाव लड़ने को आधार बनाकर ही उन्हें पदमुक्त कर दिया था। यहां यूपी कॉलेज परिसर में 1941 में चल रहे हीवेट क्षत्रिय स्कूल में कक्षा सात में दाखिला लेने के बाद यहां से इंटर की परीक्षा पास की। इसके बाद बीएचयू में दाखिला लिया।
1950 में एमए पूरा करने के बाद 1953 में उन्हें हिंदी विभाग में अस्थायी प्रवक्ता के रूप में पढ़ाने लगे। बीएचयू में प्रवक्ता रहते-रहते ही उन्होंने मार्च, 1959 में लोकसभा उपचुनाव लड़ने का निर्णय लिया और वहां चुनाव भी लड़ा लेकिन सफलता नहीं मिली। बिना विश्वविद्यालय प्रशासन की अनुमति के चुनाव लड़ने की वजह से उन्हें शिक्षक पद से मुक्त कर दिया गया। उन्होंने हार नहीं मानी तो इसी साल सागर विश्वविद्यालय चले गए और साल भर बाद विश्वविद्यालय छोड़ दिया। फिर जोधपुर विश्वविद्यालय और बाद में जेएनयू में हिंदी विभाग में अपनी सेवाएं दीं।