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बचपन में मुफलिसी में कटे पूनम यादव के दिन, पिता के पास नहीं थे घर चलाने तक को पैसे

टीम डिजिटल,वाराणसी Updated Fri, 13 Apr 2018 11:38 AM IST
poonam yadav
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मुफलिसी का आलम ये था कि 2014 ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में हिस्सा लेने के लिए पूनम के पिता ने भैंस बेच दिए थे। जब वहां कांस्य पदक जीता तो मिठाई बांटने के लिए पैसे नहीं थे। बीते दिन का जिक्र करते ही पूनम का मां और दादी की आखों से आंसू की धारा फूट पड़ती है। मां बाप के खेतों में काम से लेकर घर में भैंस और अन्य जानवरों को चारा देने तक का काम पूनम ही करती थी, लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था। आगे की स्लाइड्स में देखें ..

 
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बनारस में आज सबकी जुबां पर बस एक ही नाम है। और वो है पूनम यादव का नाम। बनारस के दांदूपुर गांव निवासी किसान की बेटी पूनम यादव ने राष्ट्रमंडल खेल गोल्ड मेडल जीतकर न ही देश का मान बढ़ाया, बल्कि अपने मां बाप के उस सपने को भी पूरा किया, जो उन्होंने मुफलिसी के दौर में कभी अपनी खुली आंखों से देखे थे। राष्ट्रमंडल खेल में जब पूनम ने वेटलिफ्टिंग में भारत को पांचवा गोल्ड मेडल दिलाया तो उनके परिवार,गांव सहित पूरे बनारस में में खुशी का माहौल छा गया। पूनम ने कहा कि देश के लिए गोल्ड मेडल जीतना गर्व की अनुभूति है। ये मेडल देश और बनारस को समर्पित है।
 
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हर कोई अपनी लाडली की इस उपलब्धि पर फूला नहीं समा रहा है। यही वजह है कि आज पूनम के घर पर जश्न का माहौल है। सीएम योगी, पीएम मोदी,राष्ट्रपति, सहित कई बड़े नेताओं ने पूनम की इस उपलब्धि पर शुभकामनाएं दी है। शहर के सभी खिलाड़ी, जनप्रतिनिधिओं ने पूनम के घर पहुंच कर खुशियां मनाईं।  2014 के ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में पूनम ने कांस्य जीतकर भारत को दिया था।

 
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इस उपलब्धि से पूनम के परिजन बेहद खुश हैं। वजह आज पूनम जिस मुकाम पर है, शायद उसकी कल्पना भी परिवार में किसी ने नहीं की थी। पिता कैलाश यादव मामूली किसान हैं और पूनम अब रेलवे में टीटीई है। मां का सपना था कि बेटी इस बार गोल्ड लाए और वो पूरा हो गया। पूनम की मां का कहना है कि बिटिया ने जब से खेलना शुरु किया है, तो घर का हर कमरा मेडल, शील्ड और सर्टिफिकेट से भरा हुआ है। बस कमी है तो गोल्ड की, जो उनकी बेटी ने आज जीतकर पूरा कर दिया।


 
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पूनम पांच बहन और दो भाइयों में चौथे पर नंबर है। मां उर्मिला जहां आज बेटी पूनम की उपलब्धि पर फूले नहीं समा रही है, वहीं बीते दिनों को याद नहीं करना चाहती। संघर्ष की बात पूछते ही मां उर्मिला ने भरे गले से कहा कि उन दिनों के बारे में अब मत पूछिए क्योंकि वह दौर हम सब भूलना चाहते हैं। बेटी घर में कुछ अलग करना चाहती थी, लेकिन गरीबी और मुफलिसी की वजह से हम सब उसकी मदद नहीं कर पा रहे थे।

 
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