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बनारस मेटल क्राफ्ट में है ऐसा आकर्षण कि ठहर जाए नजर

Fri, 24 Nov 2017 06:17 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी Updated Fri, 24 Nov 2017 06:17 PM IST
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Banaras metal craft attract tourist
बनारस मेटल क्राफ्ट - फोटो : अमर उजाला
बनारस मेटल क्राफ्ट और अध्यात्म का गहरा रिश्ता है। मंदिर हो या कोई भव्य प्रसाद, यह कला ऐसा आकर्षण पैदा करती है कि भक्त हों या कलाप्रेमी इसकी खूबसूरती देख अभिभूत हो जाते हैं। काशी की इस पारंपरिक कला की सुदूर देशों तक बड़ी मांग है। बड़ा लालपुर स्थित पं. दीनदयाल हस्तकला संकुल की दीर्घा में प्रदर्शित आकर्षक बनारस मेटल क्राफ्ट पर सैलानियों और शिल्प प्रेमियों की नजर बरबस ही ठहर जाती है। आगे की स्लाइड्स में देखें...
Banaras metal craft attract tourist
बनारस मेटल क्राफ्ट - फोटो : अमर उजाला
कसेरा समुदाय का पुश्तैनी कारोबार है बनारस मेटल क्राफ्ट। करीब 300 परिवारों द्वारा तांबे, पीतल और सोने-चांदी के बर्तनों, मुकुट, छत्र, दरवाजे के पैनल तथा आभूषण बनाने का कार्य किया जा रहा है। काशी विश्वनाथ मंदिर, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर लगे स्वर्ण शिखर, पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर, श्रवणबेलगोला जैन मंदिर पर की गई कारोबारी इस कला का जीवंत उदाहरण हैं। यह कारोबार लगभग 100 करोड़ रुपये सालाना का है।
Banaras metal craft attract tourist
बनारस मेटल क्राफ्ट - फोटो : अमर उजाला
लाख के आधार पर तांबा, पीतल और चांदी की चादर पर हाथ से पारंपरिक औजारों की सहायता से बारीक नक्काशी की जाती है। इस कला को ब्रिटिश काल में ‘रिपोजी’ नाम दिया गया। 18वीं शताब्दी के ब्रिटिश गजेटियर में इसका उल्लेख किया गया है। 
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बनारस मेटल क्राफ्ट - फोटो : अमर उजाला
वर्तमान समय में सातवीं पीढ़ी के कारीगर इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ा रहे हैं। तरन-तारन के प्रसिद्ध गुरूद्वारे की पालकी, सिंगनापुर के प्रसिद्ध शनि मंदिर में शनि देव की पालकी भी इसी कला से तैयार हुए जो बनारस के मेटल की रिपोजी कला को प्रमाणित करते हैं। 
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बनारस मेटल क्राफ्ट
इस पारंपरिक कला से जुड़े अनिल कसेरा, विजय कसेरा, अशोक कसेरा, संजय कुमार का कहना है कि जीआई सर्टिफिकेशन के बाद सरकार अगर ध्यान दे तो यह शिल्प पूरी दुनिया में अपनी चमक बिखेरने की क्षमता रखता है।
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