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बेबसी: मजदूरों ने बयां किया दर्द, बोले- बस यही इच्छा कि अपनो के बीच पहुंच जाएं, तस्वीरें

Sun, 17 May 2020 04:53 PM IST
कपिल kapil मनु चौधरी, अमर उजाला, मेरठ
मनु चौधरी, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Sun, 17 May 2020 04:53 PM IST
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Meerut, Uttar Pradesh Lockdown Latest News Update, Migrant laborers said that we should reach home
लॉकडाउन में मजदूर बेबस - फोटो : अमर उजाला

कोरोना संक्रमण के चलते लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार गरीब और मजदूर वर्ग पर है। यह महामारी प्रवासी मजदूरों के लिए कई तरह की मुसीबतें लेकर आई है। इससे पैदा हुई बेरोजगारी जानलेवा साबित हो रही है। जिनके पास रोजगार नहीं रह गया है उनके पास घरों का रुख करने के सिवा कोई विकल्प शेष नहीं है। सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर ये लोग रास्ते में हादसों का भी शिकार हो रहे हैं...

Meerut, Uttar Pradesh Lockdown Latest News Update, Migrant laborers said that we should reach home
पैदल घर जाते मजदूर - फोटो : अमर उजाला

मेरठ में भी प्रशासन के दावे सिर्फ दिखावे भर के हैं। प्रवासी श्रमिक जेठ की तपती धूप से जलती सड़कों पर चलने को मजबूर हैं। कई ऐसे परिवार हैं जो साथ में महिलाएं होने की वजह से रात में सफर नहीं कर सकते हैं। बस! इनका यही कहना है कि बस अपनो के बीच पहुंच जाएं, गांव में हम मजदूरी कर लेंगे, कम से कम भूख से तो नहीं मरेंगे। टूटी-फूटी जैसी भी है छत अपनी तो है।

Meerut, Uttar Pradesh Lockdown Latest News Update, Migrant laborers said that we should reach home
लॉकडाउन में घर जाते मजदूर - फोटो : अमर उजाला

कानपुर नगर के तहसील बिल्हौर के गांव बदन निविदा निवासी दुर्गा प्रसाद का परिवार मेरठ के नौचंदी क्षेत्र में कपड़े की फैक्टरी में काम करता था। लॉकडाउन के चलते दुर्गा प्रसाद अपने गांव में फंस गए। उनकी पत्नी सीता, बेटा और 10 साल की बेटी मेरठ में रह गए। महिला बताती हैं कि खाने के लिए न राशन है और न ही रहने के लिए घर। ऐेसे में जो मिला वह खा लिया। मजदूरी के रुपये खत्म हो चुके हैं। घर जाने के लिए निकले थे परंतु रोडवेज बस नहीं मिली। ट्रक और डीसीएम वाले मुंह मांगे रुपये मांगते हैं। बेटी साथ है यदि कोई अनहोनी हो गई तो किसे मुंह दिखाएंगे? घर से निकले थे तो पुलिस ने महिला की हालत देख हाईवे तक रिक्शा कराया। महिला कहती हैं कि बस किसी तरह गांव की मंजिल मिल जाए। कम से कम भूखे तो नहीं मरेंगे। टूटे मकान में जिंदगी इससे तो अच्छी गुजर रही थी।

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... और ये मुस्कराई - फोटो : अमर उजाला

तीन दिन से पैदल चल रहे
कन्नौज निवासी दिलीप, छोटू, कोमल, मनोज, श्याम समेत 15 से अधिक लोग लुधियाना स्थित एक फैक्टरी में काम करते थे। फैक्टरी बंद हो गई। फैक्टरी मालिक ने उनसे घर चले जाने के लिए कह दिया। ये शनिवार दोपहर में हापुड़ रोड से चेहरे अंगोछे से ढके आगे बढ़ रहे थे। किसी के सिर पर सामान से भरा थैला था तो कोई बगल में दबाए चल रहा था। ये वाहन नहीं मिलने की वजह से तीन दिन से पैदल चल रहे हैं।

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भोजन करता मजदूर - फोटो : अमर उजाला

भोजन मिला तो जान में जान आई
फिरोजाबाद के फरिया कोटला निवासी 22 वर्षीय उदयवीर करनाल में राइस मिल में काम करता था। लॉकडाउन के चलते मिल बंद हो गई। वह कई दिन करनाल में सड़कों किनारे सोए और मांगकर भोजन किया। उदयवीर के पास 2500 रुपये थे। उनमें से एक हजार रुपये की साइकिल खरीदी। वह बीते शुक्रवार को साइकिल से चलकर शनिवार दोपहर मेरठ पहुंचा। अब जेब में महज 50 रुपये हैं और भूख प्यास से व्याकुल था। बेगमपुल पर खाना बांट रहे कुछ लोगों ने उसे पैकेट थमाया तो जान में जान आई। वहीं, ईश्वर का धन्यवाद किया।

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