राजस्थान के पत्थर नक्काशी कारीगर विनोद और धर्मवीर शाही जामा मस्जिद में कुरान की आयतें उकेर रहे हैं। शहरकाजी जैनुस साजिद्दीन और मुस्लिम समाज के लोग उनकी कला के कायल हो गए हैं। दोनों कारीगर कला के साथ सामाजिक सौहार्द का संदेश भी दे रहे हैं। अब तक वह 50 से ज्यादा धार्मिक स्थलों में काम कर चुके हैं।
1306 में शाही जामा मस्जिद का निर्माण सुल्तान नासिरुद्दीन शाह ने शुरू कराया। करीब 700 साल पहले बनी मस्जिद की इमारतें कमजोर हो चली हैं। इसे लेकर अक्सर मस्जिद में निर्माण कार्य चलता रहता है। मस्जिद प्रबंधन मस्जिद के इतिहास को संजोना चाहता है। इसे लेकर मस्जिद में काम जारी है। मस्जिद के गेट पर कुरान की आयतें व इतिहास अरबी में लिखा था। इस पर हर साल पेंट कराना पड़ता था। मस्जिद प्रबंधन ने कुरान की आयतों व इतिहास को संजोने के लिए अहम कदम उठाया। उन्होंने मस्जिद के गेट पर लिखी आयतों और इतिहास को राजस्थानी पत्थर पर उकेरने का निर्णय लिया। इस कार्य को राजस्थान के करौली जिला निवासी हिंदू कारीगर विनोद, धर्मवीर व विकल्प अंजाम दे रहे हैं।
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मेरठ में शाही जामा मस्जिद
- फोटो : amar ujala
20 से 25 लाख आया खर्च
ठेकेदार बबलू चौरसिया ने बताया करीब 400 फीट पत्थर से गेट तैयार हुआ है। इसमें पत्थर की कीमत तो एक से डेढ़ लाख रुपये है, लेकिन इसकी कारीगरी बहुत महंगी है। इसमें 20 से 25 लाख रुपये का खर्च आया है। पिछले चार साल से काम चल रहा है। कोरोना काल में काम बंद रहा। कारीगरों ने बताया कि अक्षर धाम मंदिर सहित कई ऐतिहासिक स्थलों पर यही पत्थर लगाया गया है।
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शाही जामा मस्जिद
- फोटो : amar ujala
अरबी भाषा का ज्ञान नहीं
कारीगर विनोद ने बताया उन्हें अरबी भाषा का ज्ञान तो नहीं है, लेकिन आयतों को देखकर पत्थर पर उकेरने की कला बखूबी जानते हैं। इसे देखकर उलमा भी हैरान हैं। विनोद इतनी सफाई से आयतें उकेर रहे हैं, जैसे किसी ने अपनी कलम से आयतें लिख दी हों।
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शाही जामा मस्जिद
- फोटो : amar ujala
राजस्थानी कारीगरों के कायल हुए शहरकाजी
राजस्थानी कारीगरों की नक्काशी की कला देखकर शहरकाजी जैनुस साजिद्दीन भी कायल हो गए हैं। बिना अरबी जाने उसको हूबहू लिखना अच्छी कला है।
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शहरकाजी जैनुस साजिद्दीन
- फोटो : amar ujala
उन्होंने बताया कि आजादी के बाद से उनके पिता जैनुल आबिद्दीन शाही जामा मस्जिद के मुतवल्ली और शहरकाजी रहे, जबकि 1991 में पिता की मौत के बाद ये जिम्मेदारी उनके पास है। लेकिन मस्जिद की इमारत बहुत पुरानी हो चुकी है।