एक्सप्लेनर: उत्तर प्रदेश के चार हिस्से हुए तो कहां होंगे आप, राजभर से पहले कौन-कौन कर चुका बंटवारे की मांग?
उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन यह कहानी सिर्फ राजभर के बयान तक सीमित नहीं है। करीब सात दशक पहले अंबेडकर ने भी यूपी को छोटे राज्यों में बांटने का सुझाव दिया था। इसके बाद मायावती सरकार ने चार राज्यों का प्रस्ताव विधानसभा से पास कराया। अब सवाल है कि यूपी को बांटने की मांग बार-बार क्यों उठती रही और अगर ऐसा हुआ तो तस्वीर कैसी होगी? आइए जानते हैं।
विस्तार
ऐसे में जानते हैं कि उत्तर प्रदेश कैसे बना? राजभर ने क्या कहा, आखिर यूपी को बांटने की मांग क्यों होती है? जिन चार हिस्सों में राज्य को बांटने की बात की जाती है वो क्या हैं? इन चारों हिस्सों में कौन से जिले और क्षेत्र आते हैं? किसी राज्य के बंटवारे की क्या प्रक्रिया होती है? संविधान में इसे लेकर क्या कहा गया है? पहले उत्तर प्रदेश का बंटवारा कब और कैसे हुआ था? देश के और किन राज्यों का बंटवारा हो चुका है?
उत्तर प्रदेश के बनने का इतिहास
ब्रिटिश शासन के दौरान उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत कहा जाता था। स्वतंत्र भारत की नई संवैधानिक व्यवस्था के तहत 24 जनवरी 1950 को संयुक्त प्रांत का नाम बदलकर उत्तर प्रदेश कर दिया गया। इस बदलाव के दौरान न तो किसी नए राज्य का गठन हुआ था और न ही राज्य की सीमाओं में कोई बड़ा बदलाव किया गया था, बल्कि मौजूदा राज्य का सिर्फ आधिकारिक नाम बदला गया था। हालांकि, उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां, विकास और रोजगार की कमी, पलायन और प्रशासनिक जरूरतें मैदानी इलाकों से अलग होने के कारण अलग राज्य की मांग धीरे-धीरे उठती रही।1990 के दशक में यह मांग बड़े जनआंदोलन में बदल गई। इसके बाद केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई और संसद ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 पारित किया। 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश के 13 जिलों को अलग करके उत्तरांचल भारत का नया राज्य बना, जिसे 2007 में उत्तराखंड नाम दिया गया।
अब क्यों राज्य के बंटवारे की बात चर्चा में?
उत्तर प्रदेश के मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने हाल ही में दावा किया कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश का चार हिस्से होना तय है। उन्होंने कहा कि पूर्वांचल अलग राज्य बना तो वहां राजभर समाज का बेटा ही पहला मुख्यमंत्री बनेगा। राजभर ने कहा कि बुंदेलखंड में अलग राज्य की मांग है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश की मांग उठती रही है, जबकि मध्यांचल और पूर्वांचल को भी अलग राज्य बनाने की मांग है।- राजभर जिन चार हिस्सों की बात कर रहे हैं, उनमें पूर्वांचल पूर्वी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र है। यहां आबादी का घनत्व अधिक है और बेरोजगारी व पलायन जैसी चुनौतियों हैं।
- मध्यांचल या अवध प्रदेश मध्य उत्तर प्रदेश का क्षेत्र है, जिसका केंद्र लखनऊ और कानपुर जैसे बड़े प्रशासनिक और आर्थिक केंद्र हैं।
- दक्षिणी हिस्से का बुंदेलखंड संसाधनों की कमी और सूखे की समस्या वाला क्षेत्र रहा है, जहां विकास के लिए बड़े जल ढांचा परियोजनाओं को महत्वपूर्ण माना जाता है।
- वहीं, हरित प्रदेश या पश्चिम प्रदेश में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र आता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से नजदीकी और मजबूत कृषि ढांचे को इसके आर्थिक विकास की संभावनाओं से जोड़ा जाता है।
क्या किसी और ने भी इस तरह की बात की है?
कांग्रेस नेता इमरान मसूद भी उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने के विचार का समर्थन कर चुके हैं। उन्होंने राज्य के बड़े आकार का हवाला देते हुए कहा कि एक कोने से दूसरे कोने तक जाने में 24 घंटे से ज्यादा लग सकता है। उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को न्याय के लिए करीब 800 किलोमीटर तक यात्रा करने की बात कही और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने का सुझाव दिया।अंबेडकर ने दिया था तीन राज्यों का प्रस्ताव
उत्तर प्रदेश को बांटने की मांग कई दशक पुरानी है। डॉ. बीआर अंबेडकर ने 1955 में अपनी किताब 'भाषावार राज्यों के संबंध में विचार' में उत्तर प्रदेश को तीन छोटे राज्यों में बांटने का सुझाव दिया था।अंबेडकर ने उत्तर प्रदेश के साथ बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को भी छोटे हिस्सों में बांटने की बात कही थी। उनका प्रस्ताव था कि उत्तर प्रदेश को तीन राज्यों में विभाजित किया जाए। उन्होंने इन तीन प्रस्तावित राज्यों के लिए मेरठ, कानपुर और इलाहाबाद को राजधानी के तौर पर बताया था।
उसी दौर में पश्चिमी यूपी से भी उठी थी अलग राज्य की मांग
1955 की राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विधायकों की ओर से राज्य को बांटने का प्रस्ताव भी दर्ज हुआ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 16 जिलों के 97 विधायकों ने एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। हालांकि बाद में करीब 70 विधायक इस समर्थन से पीछे हट गए।अलग राज्य के समर्थकों का तर्क था कि उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा है और इसे प्रभावी तरीके से चलाना मुश्किल है। उनका कहना था कि पश्चिमी जिलों से पर्याप्त राजस्व आने के बावजूद इन क्षेत्रों की अनदेखी हो रही है। राज्य पुनर्गठन आयोग ने उत्तर प्रदेश को विभाजित करने की मांग को स्वीकार नहीं किया और यूपी को एक ही राज्य बनाए रखने की सिफारिश की।
हालांकि आयोग के सदस्य केएम पणिक्कर ने इससे अलग राय दी। उन्होंने बड़े उत्तर प्रदेश को विभाजित करने का समर्थन किया और पश्चिमी हिस्से के लिए मेरठ, आगरा, रोहिलखंड यानी बरेली और झांसी मंडलों को शामिल करने वाला अलग राज्य प्रस्तावित किया था।
राज्य पुनर्गठन के बाद भी उठती रही मांग
राज्य पुनर्गठन के बाद भी उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांग खत्म नहीं हुई। पूर्वांचल के लिए अलग राज्य की मांग कई दशकों से चली आ रही है। इसके लिए पूर्वांचल बनाओ मंच और पूर्वांचल राज्य स्थापना समिति जैसे संगठनों ने अभियान चलाए।इसी तरह दक्षिणी हिस्से के बुंदेलखंड के लिए भी अलग राज्य की मांग उठती रही। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अलग राज्य की मांग हरित प्रदेश, पश्चिम प्रदेश या पश्चिमांचल जैसे अलग-अलग नामों से सामने आती रही।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग राज्य की मांग को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से जुड़ी राजनीतिक परंपरा में लगातार समर्थन मिला। बाद में उनके बेटे और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह ने हरित प्रदेश की मांग को राष्ट्रीय लोक दल यानी आरएलडी के प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में शामिल किया।
अजित सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अलग राज्य की मांग करने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल रहे। हालांकि अलग-अलग प्रस्तावों में हरित प्रदेश की सीमाएं एक जैसी नहीं रही हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अलग राज्य की मांग के समर्थन में यहां की गन्ना आधारित अर्थव्यवस्था, कृषि, व्यापार और विनिर्माण क्षेत्र के साथ दिल्ली से इसकी नजदीकी का भी हवाला दिया जाता रहा है।
2011 में मायावती सरकार ने विधानसभा में पास किया प्रस्ताव
नवंबर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने उत्तर प्रदेश को चार अलग-अलग राज्यों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित किया था। इस प्रस्ताव में अवध प्रदेश, पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिम प्रदेश बनाने की बात कही गई थी। प्रस्ताव को केंद्र सरकार के पास भेजा गया था।इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यूपी सरकार से प्रस्ताव को लेकर 8 से 9 अहम बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा था। केंद्र यह जानना चाहता था कि अगर यूपी को चार राज्यों में बांटा जाता, तो उनकी राजधानियां कहां होंगी और सीमाएं किस तरह तय की जाएंगी।
गृह मंत्रालय ने यह भी पूछा था कि यूपी में तैनात ऑल इंडिया सर्विस के अधिकारियों का चारों प्रस्तावित राज्यों के बीच बंटवारा कैसे किया जाएगा। इसके अलावा राज्य की संपत्तियों और देनदारियों के बंटवारे से जुड़े सवाल भी उठाए गए थे।
केंद्र की एक बड़ी चिंता यूपी के बढ़ते कर्ज को लेकर थी। उस समय उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2010-11 में यूपी का सार्वजनिक कर्ज करीब 1.80 लाख करोड़ रुपये था और 2011-12 में इसके करीब 2.04 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। गृह मंत्रालय ने यह भी जानना चाहा था कि चारों राज्यों के बीच पेंशन की देनदारी और राजस्व का बंटवारा किस तरह किया जाएगा।
बाद में केंद्र के आधिकारिक जवाब में बताया गया था कि गृह मंत्रालय ने दिसंबर 2011 में यूपी सरकार से मांगी गई जानकारी का इंतजार किया था, लेकिन वह जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई थी। 2014 में केंद्र ने कहा था कि यूपी से नए राज्य बनाने का कोई प्रस्ताव उसके विचाराधीन नहीं था।
प्रस्तावित चार राज्य कौन से हैं?
मायावती की सरकार ने कोई आधिकारिक नक्शा पेश नहीं किया था। इसलिए कुछ जिलों को लोग क्षेत्रीय पहचान के आधार पर अलग-अलग हिस्सों में जोड़ते हैं, अवध के कुछ जिलों को पूर्वांचल में जोड़ा जाता है। हालांकि, अगर उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटा जाए, तो ये जिले इन प्रस्तावित राज्यों में आ सकते हैं।पश्चिम प्रदेश/ हरित प्रदेश: इसमें 26 जिले शामिल माने जाते हैं। आगरा, मथुरा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, अलीगढ़, एटा, हाथरस, कासगंज, बदायूं, बरेली, पीलीभीत, शाहजहांपुर, बागपत, बुलंदशहर, गौतम बुद्ध नगर, गाजियाबाद, मेरठ, हापुड़, बिजनौर, अमरोहा, मुरादाबाद, रामपुर, संभल, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और शामली।
अवध प्रदेश: इसमें 17 जिले शामिल माने जाते हैं। अंबेडकर नगर, अयोध्या, सुल्तानपुर, अमेठी, बाराबंकी, औरैया, इटावा, फर्रुखाबाद, कन्नौज, कानपुर देहात, कानपुर नगर, हरदोई, लखीमपुर खीरी, लखनऊ, रायबरेली, सीतापुर और उन्नाव। हालांकि, कई लोग अंबेडकर नगर, सुल्तानपुर जैसे जिलों को पूर्वांचल में शामिल करते हैं।
बुंदेलखंड: बुंदेलखंड ऐसा इलाका है, जिसमें उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों के जिलों को मिलाकर एक नया प्रदेश बनाने की मांग होती रही है। उत्तर प्रदेश के सात जिले, झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट इसमें शामिल हैं। वहीं, मध्य प्रदेश के सागर, दमोह, टीकमगढ़, छतरपुर, निवाड़ी, पन्ना और दतिया जैसे जिलों को भी इसमें शामिल करने की बात होती रही है। इसी वजह से अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग में क्षेत्रीय सीमा एक जटिल मुद्दा रही है।
पूर्वांचल: इसमें मोटे तौर पर 25 जिले शामिल माने जाते हैं। आजमगढ़, बलिया, मऊ, बस्ती, संत कबीर नगर, सिद्धार्थनगर, बहराइच, बलरामपुर, गोंडा, श्रावस्ती, देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर, महाराजगंज, मिर्जापुर, भदोही, सोनभद्र, प्रयागराज, फतेहपुर, कौशांबी, प्रतापगढ़, चंदौली, गाजीपुर, जौनपुर और वाराणसी।
छोटे राज्यों की मांग के पीछे क्या तर्क है?
बंटवारे के समर्थकों का कहना है कि छोटे राज्यों का प्रशासन आसान होता है। उत्तर प्रदेश भौगोलिक रूप से बहुत बड़ा है और इसके अलग-अलग हिस्सों की आर्थिक संरचना, भौगोलिक स्थिति, कृषि व्यवस्था, पलायन के रुझान और ऐतिहासिक पहचान में अंतर है। राज्य में फिलहाल 403 विधानसभा सीटें हैं, जो देश के किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा हैं।वहीं, बंटवारे का विरोध करने वालों का तर्क है कि सिर्फ नया राज्य बना देने से विकास की असमानताएं खत्म नहीं होंगी। नए राज्यों के गठन में वित्तीय और संस्थागत स्तर पर भी जटिलताएं हो सकती हैं।
किसी राज्य को बांटने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?
किसी राज्य को बांटकर नया राज्य बनाने के लिए संविधान में प्रक्रिया तय है। इसका आधार अनुच्छेद 3 है। अनुच्छेद 3 संसद को नए राज्य बनाने और मौजूदा राज्यों के क्षेत्र, सीमाओं या नाम में बदलाव करने की शक्ति देता है।अनुच्छेद 3(क): नया राज्य बनाना
संसद कानून बनाकर नया राज्य बना सकती है। इसके लिए किसी मौजूदा राज्य से क्षेत्र अलग किया जा सकता है, दो या उससे ज्यादा राज्यों या उनके हिस्सों को मिलाया जा सकता है या किसी राज्य के हिस्से में कोई क्षेत्र जोड़ा जा सकता है।
अनुच्छेद 3(ख): राज्य का क्षेत्र बढ़ाना
संसद किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ा सकती है। इसके लिए किसी दूसरे राज्य या क्षेत्र का भू-भाग उसमें जोड़ा जा सकता है।
अनुच्छेद 3(ग): राज्य का क्षेत्र घटाना
किसी राज्य के क्षेत्र को कम भी किया जा सकता है। इसके तहत राज्य के किसी हिस्से को अलग करके पुनर्गठन, विलय या नया राज्य या केंद्र शासित प्रदेश बनाया जा सकता है।
अनुच्छेद 3(घ): सीमाओं में बदलाव
संसद राज्यों के बीच की सीमाओं में बदलाव कर सकती है। यानी राज्यों के बीच सीमा की मौजूदा रेखाओं को बदला जा सकता है।
अनुच्छेद 3(ङ): राज्य का नाम बदलना
संसद कानून बनाकर किसी राज्य का आधिकारिक नाम भी बदल सकती है।
राज्य की विधानसभा की क्या भूमिका होती है?
अनुच्छेद 3 के तहत राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में बदलाव करने वाले विधेयक पर राष्ट्रपति प्रभावित हो राज्य की राय ले सकते हैं। अगर विधेयक किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम को प्रभावित करता है तो राष्ट्रपति उसे संबंधित राज्य की विधानसभा के पास उसकी राय जानने के लिए भेजते हैं। विधानसभा को अपनी राय देने के लिए एक निश्चित अवधि दी जाती है।अनुच्छेद 3 की व्याख्या में यह भी कहा गया है कि खंड (क) से (ङ) में 'राज्य' के भीतर केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल है। हालांकि जिस प्रावधान में राज्य विधानसभा से राय लेने की बात है, वहां 'राज्य’' में केंद्र शासित प्रदेश शामिल नहीं है।
अनुच्छेद 3 का खंड (क) संसद को किसी क्षेत्र के हिस्से को मिलाकर नया राज्य या केंद्र शासित प्रदेश बनाने की शक्ति से भी जुड़ा है।
भारत में राज्यों का पुनर्गठन: कौन किससे अलग हुआ?
आंध्र राज्य: तेलुगु भाषी लोगों की अलग राज्य की मांग और भाषाई पहचान के आधार पर मद्रास राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों को अलग करके 1953 में आंध्र राज्य बनाया गया।
आंध्र प्रदेश: भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के दौरान आंध्र राज्य और हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों को मिलाकर 1956 में आंध्र प्रदेश बनाया गया।
तेलंगाना: तेलंगाना क्षेत्र की अलग क्षेत्रीय पहचान, विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे आंदोलन के बाद 2014 में आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन से तेलंगाना बना। इसके लिए आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 लागू किया गया।
महाराष्ट्र और गुजरात: मराठी और गुजराती भाषी क्षेत्रों के लिए अलग राज्यों की मांग के बाद बॉम्बे राज्य का पुनर्गठन करके 1960 में महाराष्ट्र और गुजरात बनाए गए।
नागालैंड: नागा क्षेत्र की अलग राजनीतिक और प्रशासनिक पहचान की मांग के बाद असम के नागा हिल्स-तुएनसांग क्षेत्र को अलग करके 1963 में नागालैंड बनाया गया।
हरियाणा: हिंदी भाषी क्षेत्रों के लिए अलग राज्य की मांग और पंजाब के पुनर्गठन के बाद 1966 में हरियाणा बनाया गया। इसी पुनर्गठन में चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
मेघालय: खासी, जयंतिया और गारो पहाड़ी क्षेत्रों की अलग प्रशासनिक पहचान और मांग के बाद 1972 में मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
मणिपुर: पहले केंद्र शासित प्रदेश रहा मणिपुर क्षेत्रीय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांगों के बीच 1972 में पूर्ण राज्य बना।
त्रिपुरा: केंद्र शासित प्रदेश के रूप में रहने के बाद राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक जरूरतों के आधार पर 1972 में त्रिपुरा को पूर्ण राज्य बनाया गया।
सिक्किम: सिक्किम किसी भारतीय राज्य से अलग होकर नहीं बना। भारत के साथ संवैधानिक एकीकरण की प्रक्रिया के बाद 1975 में इसे भारत का पूर्ण राज्य बनाया गया।
मिजोरम: अलग राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की मांग व शांति समझौते के बाद 1987 में मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
अरुणाचल प्रदेश: पहले केंद्र शासित प्रदेश रहे इस क्षेत्र को बेहतर प्रशासन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए 1987 में पूर्ण राज्य बनाया गया।
गोवा: पुर्तगाली शासन से मुक्ति के बाद केंद्र शासित प्रदेश रहा गोवा 1987 में पूर्ण राज्य बना।
छत्तीसगढ़: मध्य प्रदेश के बड़े आकार और छत्तीसगढ़ क्षेत्र की अलग क्षेत्रीय पहचान व विकास संबंधी मांगों के बाद 2000 में मध्य प्रदेश के पुनर्गठन से छत्तीसगढ़ बना।
झारखंड: बिहार के दक्षिणी आदिवासी बहुल क्षेत्रों की अलग क्षेत्रीय पहचान और लंबे अलग राज्य आंदोलन के बाद 2000 में बिहार के पुनर्गठन से झारखंड बना।