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महाभारत सर्किट: विकास यात्रा में गौण रहा गढ़मुक्तेश्वर, भगवान शिव ने इसे बताया था काशी से भी पवित्र

Thu, 12 Mar 2020 01:19 PM IST
Dimple Sirohi रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Thu, 12 Mar 2020 01:19 PM IST
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Mahabharata Circuit: Garhmukteshwar is more sacred than Kashi in the journey of development
गढ़मुक्तेश्वर - फोटो : अमर उजाला

गंगा के तट पर बसा गढ़मुक्तेश्वर पुराणों में प्रकाशित वह नाम है जिसे भगवान शिव ने काशी से भी अधिक पवित्र कहा है। शिव का प्रिय धाम शिवबल्लभपुर गणों की मुक्ति होने से गणमुक्तीश्वर और बाद में गढ़मुक्तेश्वर कहलाया। महाभारत युद्ध में अपने असंख्य प्रियजनों को खोने के बाद पांडवों ने यहीं आकर उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान व गंगा स्नान किया था। जिस परंपरा में कार्तिक पूर्णिमा का मेला यहां आज भी चला आ रहा है। 

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Mahabharata Circuit: Garhmukteshwar is more sacred than Kashi in the journey of development
गढ़मुक्तेश्वर - फोटो : अमर उजाला
ऐसे महिमामय तीर्थ को विकास की यात्रा में पूर्ण रूप से गौण रखा गया। गढ़मुक्तेश्वर की उदास सूरत में उसके पौराणिक महत्व का तेज नहीं चमकता। यहां से करीब आठ किमी दूर ब्रजघाट पर श्रद्धालुओं की रौनक है।

वर्तमान में वही लोगों की आस्था का केंद्र है। गढ़मुक्तेश्वर का आंगन सूना है। वह आंगन जहां मुक्तेश्वर महादेव विराजे है। जिनके दर्शन मात्र से मनुष्य मुक्ति का अधिकारी हो जाता है। ऐसी अनेक विरासत यहां भक्तों को पुकार रही हैं।
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गढ़मुक्तेश्वर - फोटो : अमर उजाला
हापुड़ से 35 किमी दूर गढ़मुक्तेश्वर को गढ़ भी कहा जाता है। सबसे पहले मुक्तेश्वर महादेव के मंदिर चलते है। गर्भगृह में मुक्तेश्वर महादेव का गड्ढे से युक्त शिवलिंग है। प्राचीन होने के कारण शिवलिंग का पत्थर घिस गया है।

गढ़मुक्तेश्वर का पौराणिक खांडवी वन का पौराणिक इतिहास (लेखक मदनपाल सिंह) पत्रिका में लिखा है कि गणों ने मुक्तेश्वर महादेव का पूजन किया है। शिव पुराण में मुक्तेश्वरा शब्द का उल्लेख है। भगवान शिव ने स्वयं कहा है कि मैं वहां निवास करता हूं। पांडवों ने भी मुक्तेश्वर महादेव की पूजा की है। पत्रिका के अनुसार परशुराम ने इस शिवलिंग की स्थापना की है।
Mahabharata Circuit: Garhmukteshwar is more sacred than Kashi in the journey of development
गढ़मुक्तेश्वर - फोटो : अमर उजाला
नहुष कूप 
मंदिर प्रांगण में नहुष कूप या नक्का कुआं है। राजा नहुष जो किसी शाप वश अजगर योनि में आ गए थे, युधिष्ठिर के कहने पर यहीं पाप मुक्त हुए थे। उन्होंने मुक्तेश्वर मंदिर के प्रांगण में एक बाबड़ी बनवाई जो नहुष कूप के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं दुर्गा मंदिर है जिसका निर्माण संवत 1883 (सन् 1826) में  हुआ। मंदिर में भैरव और दुर्गा की मूर्तियां विराजमान हैं। मुक्तेश्वर मंदिर के पीछे एक छोटे से मठ में झारखंडेश्वर महादेव विराजमान हैं। कहा जाता है कि यह शिवलिंग परशुराम द्वारा स्थापित है।
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गढ़मुक्तेश्वर - फोटो : अमर उजाला
गढ़मुक्तेश्वर का इतिहास  
‘गढ़मुक्तेश्वर खांडवी वन का पौराणिक इतिहास’ पत्रिका के अनुसार इस तीर्थ का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। गढ़मुक्तेश्वर का पुराना नाम शिवबल्लभपुर है। यह शिव का प्रिय धाम है। यहां श्राद्ध करने से पितरों की मुक्ति होती है। भगवान शिव पार्वती से कहते हैं, हे देवि! काशी में मरने से मुक्ति मिलती है लेकिन गणमुक्तीश्वर के दर्शन मात्र से मनुष्य मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।
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