कारगिल के बलिदानी पन्नों पर बागपत के बेटों ने लहू से विजयीगाथा लिखी थी। जिले के चार सैनिकों ने देश के लिए बलिदान दिया। सेनानी अमर हो गए और बाकी रह गई उनकी यादें। बलिदान के पन्नों पर लिखी शौर्य गाथा पढ़कर आज भी जिला गौरवान्वित होता है। जवानों की बहादुरी के किस्से सुनकर लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। परिवार के लोग लाडलों को याद कर भावुक हो जाते हैं। कहते हैं कि बलिदान पर गर्व है, लेकिन लाडलों की हर पल याद आती है।
कारगिल विजय दिवस: जिले के इन चार योद्धाओं ने दिया था बलिदान, पढ़ें- लाडलों की यादों के पल
द्रास सेक्टर में राजेंद्र सिंह ने दिया बलिदान
कारगिल युद्ध में खेकड़ा के लांस नायक राजेंद्र सिंह ने भी प्राण गवाएं थे। जाट रेजीमेंट में तैनात राजेंद्र सिंह द्रास सेक्टर में आठ जुलाई 1999 को राजेंद्र सिंह शहीद हुए। परिवार में पिता जय सिंह और माता शकुंतला देवी हैं। शहीद की पत्नी मुनेश देवी हैं और बेटा हिमांशु गाजियाबाद में रहकर पढ़ाई कर रहा है। परिवार का कहना है कि सरकार को आतंकी संगठनों पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। सैनिकों के परिवारों के लिए अधिक सुविधाएं देनी चाहिए।
शहीद अनिल के पिता बोले, अधूरी है पेंशन की मांग
जाट बटालियान में तैनात बावली गांव के अनिल कुमार ने द्रास सेक्टर में आठ जुलाई 1999 को देश के लिए अमर बलिदान दिया। शहीद के पिता सुलतान सिंह कहते हैं कि अनिल कुमार की पत्नी सविता देवी के लिए पेंशन की मांग कईं सालों से की जा रही है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। बेटे ने देश के लिए बलिदान दिया, जिस पर उन्हें गर्व है। लेकिन सरकार को सैनिकों के परिवार का ध्यान रखना चाहिए। परिवार में माता संतोष देवी, पत्नी सविता देवी, बेटी प्रिया, बेटे प्रियांशु और हिमांशु हैं।
शहीद जितेंद्र के परिजन बोले, परिवार का विशेष ध्यान रखा जाए
जिवाना गुलियान निवासी शहीद सिपाही जितेंद्र सिंह ने सात जुलाई 1999 को द्रास सेक्टर में युद्ध के दौरान बलिदान दिया। शहीद के भाई बिजेंद्र सोलंकी और मां ब्रहमकौर कहती हैं कि शहीद के माता-पिता को विशेष पेंशन राशि की व्यवस्था होनी चाहिए। सरकार को शहीदों के परिवार का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जितेंद्र के शहीद होने के बाद उसकी पत्नी अपने मायके चली गई। सरकार ने जो सहायता दी, उसका लाभ जितेंद्र की पत्नी को हुआ, परिवार को नहीं।
धामा के बलिदान पर गर्व, डॉक्टर बन गया बेटा
बिनौली गांव के हवलदार पद्म सिंह धामा का बलिदान अमर है। कारगिल की चोटियों पर सबसे पहले पद्म सिंह धामा ने ही बलिदान दिया था। भाई सौराज सिंह बताते हैं कि आठ मई 1999 को बटालिक सेक्टर में शहादत दी थी। दुश्मन घुसपैठ कर चुका था। सबसे पहले मोर्चे पर पद्म सिंह और उनकी टुकड़ी को भेजा गया था। युद्ध में दुश्मन के दांत खट्टे कर बलिदान दिया। परिवार में माता शकुंतला देवी, भाई सौराज सिंह, पत्नी मुकेश देवी, बेटे अक्षय धामा और निखिल धामा है। निखित इन दिनों ईएनटी डॉक्टर हैं। सौराज सिंह का कहना है कि सरकार को सैनिकों के परिवारों के लिए सुविधा बढ़ानी चाहिए।
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