1857 की क्रांति में बागपत के क्रांतिकारियों ने अहम भूमिका निभाई थी। 17 जुलाई 1857 को बसौद के क्रांतिकारियों ने बाबा शाहमल के नेतृत्व में देश की आजादी के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया था। क्रांतिकारियों के लहू से गांव के तालाब का पानी भी लाल हो गया था। गांव में प्रतिवर्ष 17 जुलाई को क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि दी जाती है। इसमें गांव के अधिकांश ग्रामीण उपस्थित होकर अपने पूर्वजों को याद करते हैं।
Independence Day 2020: क्रांतिकारियों के लहू से लाल हो गया था तालाब का पानी, कुछ ऐसी है पूरी कहानी
10 मई 1857 में मेरठ से शुरू हुई क्रांति की चिंगारी पूरे देश में भड़क गई थी। बागपत भी 1857 की क्रांति से अछूता नहीं रहा। बाबा शाहमल के नेतृत्व में बसौद की जामा मस्जिद को मुख्यालय बनाया गया। अंग्रेजों को क्रांतिकारियों की भनक लग गई और उन्होंने 17 जुलाई 1857 को गांव पर हमला कर दिया।
क्रांतिकारियों के खून से गांव के तालाब का पानी लाल हो गया था। अंग्रेजों ने 180 क्रांतिकारियों को मार दिया था। 15 क्रांतिकारियों को बरगद के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी थी और पूरे गांव को आग लगा दी थी। गांव में प्रत्येक वर्ष 17 जुलाई को शहादत दिवस मनाया जाता है।
इतिहासकारों का आभार व्यक्त किया
गांव के हाजी वाजिद और मास्टर सत्तार कहते हैं कि वर्ष 2007 के बाद उन्हें गांव का लिखित में इतिहास प्राप्त हुआ है। वह वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. केके शर्मा, डॉ. अमित पाठक, अमित राय जैन का आभार व्यक्त करते है।
पंडित जगरोशन कहते हैं कि गांव में गांव के लोग जातिवाद को भूलकर एक साथ मिलकर रहते हैं। मुबारक अली ने बताया गांव के गौरवान्वित इतिहास को आने वाली नई पीढ़ियों को बताकर जागरूक करते हैं।
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