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आपातकाल की कड़वी यादें: लोकतंत्र सेनानी बोले- बहुत यातनाएं झेलीं, चने और गुड़ खाकर भरते थे पेट

Fri, 26 Jun 2020 06:03 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बडौ़त/बागपत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बडौ़त/बागपत Published by: Dimple Sirohi Updated Fri, 26 Jun 2020 06:03 PM IST
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Emergency: Democracy fighters said- suffered a lot of torture, used to eat gram and jaggery to survive
विनोद कुमार जैन एडवोकेट घोड़े पर पथ संचलन करते हुए (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर थोपे गए आपातकाल की यादें आज भी लोकतंत्र सेनानियों के जख्मों को हरा कर देती हैं। 25 जून 1975 से 23 मार्च 1977 के बीच करीब 21 महीने का वह दौर जब याद आता है तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं।

Emergency: Democracy fighters said- suffered a lot of torture, used to eat gram and jaggery to survive
लोकतंत्र सेनानी प्रवीण जैन - फोटो : अमर उजाला

आपातकाल के दौर में बागपत से भी एक दर्जन से अधिक लोग जेल गए और घोर यातनाएं झेलीं। उस दौर को याद करते हुए किरठल गांव निवासी और इस समय गन्नौर रह रहे लोकतंत्र सेनानी डॉ. देवीशरण (75 वर्ष) का कहना है कि लोकतंत्र प्रेमियों के लिए 25 जून स्वतंत्र भारत के सबसे काले दिवसों में शामिल है। उस दौरान हमने बहुत यातनाएं झेलीं, लेकिन समझौते के बारे में एक बार भी नहीं सोचा।

Emergency: Democracy fighters said- suffered a lot of torture, used to eat gram and jaggery to survive
डा देवी शरण - फोटो : अमर उजाला

उस समय बाल स्वयं सेवक रहे व भाजपा विधि प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य और आरएसएस से जुड़े डॉ. विनोद जैन एडवोकेट (58) बताते हैं कि आपात काल में नगर से गुरूदत्ता मल, धर्मपाल चौहान, अभय कुमार, प्रवीण कुमार, छपरौली से सुमतप्रसाद जैन, जेठानंद, डॉ. देवी शरण किरठल, राम भरोसे भाई दोघट, अग्रवाल टटीरी के पूर्व चेयरमैन स्वर्गीय मामचंद अग्रवाल, खेकड़ा से जगमेन्द्र प्रसाद जैन, जयप्रकाश जैन दाहा वाले, टेकचन्द हीरा होटल वाले सहित संघ से पुराने समय से जुडे़ दर्जनों लोग मेरठ जेल गए थे। विनोद जैन का कहना है कि पुलिस उन्हें जेल ले जाती थी, मगर कम उम्र का होने के चलते बाद में छोड़ देती थी।

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Emergency: Democracy fighters said- suffered a lot of torture, used to eat gram and jaggery to survive
डा विनोद जैन - फोटो : अमर उजाला

संघ से कोई नाता नहीं, लिखकर देने पर नहीं भेजते थे जेल
लोकतंत्र सेनानी प्रवीण जैन (60) बताते हैं कि उस समय उनकी उम्र करीब 15-16 साल रही होगी। आपातकाल में पुलिस उन लोगों को जेल नहीं भेजती थी, जो यह लिखकर दे देते थे कि हम संघ की नीतियों में विश्वास नहीं रखते। लेकिन संघ से जुडे़ लोगों ने लिखकर देने की बजाय जेल जाना पसंद किया। उस समय चने के दाने और गुड़ खाकर पेट भरते थे।

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Emergency: Democracy fighters said- suffered a lot of torture, used to eat gram and jaggery to survive
लोकतंत्र सेनानी प्रवीण जैन और डा विनोद जैन - फोटो : अमर उजाला

संघ की गतिविधियों पर लगा दिया था प्रतिबंध
उस समय संघ की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। स्वयं सेवक भूमिगत होकर गतिविधियों को कर रहे थे। संघ का साहित्य भी प्रकाशित होता था, उस पर भी प्रतिबंध लगा था। इसके बावजूद संघ से जुड़े लोग चोरी छिपे घर-घर में पत्रक बांटते थे। 

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