फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें

मलियाना नरसंहार: आजादी के बाद की सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग, आंखों के सामने जले आशियाने, बेबस देखते रहे लोग

Mon, 03 Apr 2023 01:50 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Mon, 03 Apr 2023 01:50 PM IST
विज्ञापन
1987 Maliana Massacre: biggest custodian killing after independence, victims were helpless
मलियाना नरसंहार - फोटो : अमर उजाला

23 मई 1987, जगह-मेरठ, समय-दोपहर के करीब दो बजे थे। चारों तरफ चीख-पुकार मची थी। हर तरफ गोलीबारी हो रही थी, घर के पास दंगाई आ गए तो परिवार के सदस्य यहां से निकलकर थोड़ी दूर जाकर छिप गए। कुछ दंगाई अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे। एकाएक उन्होंने एक मकान में आग लगा दी। वह मंजर दिल दहलाने वाला था।



आशियाना आंखों के सामने ही जलता रहा, मगर वह बेबस रहे। परिवार ने किसी तरह भागकर जान बचाई। यह दास्तां सुनाते हुए दंगा पीड़ित मोहम्मद शरीफ उर्फ भूरे की आंख भर आई। उन्होंने बताया कि आशियाना तो खाक हो गया, लेकिन गनीमत रही कि परिवार के सदस्य बच गए। सेना के आने के बाद वह जल चुके मकान में पहुंचे। यहां सिर्फ राख ही थी, यह दिन वह कभी नहीं भूल पाए।

मोहम्मद शरीफ ने बताया कि लंबे संघर्ष के बाद दोबारा आशियाना तैयार किया, लेकिन इस दंगे में आशियाना खोने वाले वह इकलौते नहीं थे। उनकी तरह चमन और नौशाद अली के आशियाने भी दंगे में जल गए थे। उस समय नौशाद की उम्र 15 साल ही थी। मलियाना दंगे को भले ही करीब 36 साल हो गए हों, लेकिन कुछ परिवारों के लिए यह दंगा अभिशाप बन गया। ये परिवार इसे अब तक नहीं भूल पाए हैं।

1987 Maliana Massacre: biggest custodian killing after independence, victims were helpless
मलियाना नरसंहार - फोटो : अमर उजाला

दंगे ने छुड़ाई दहलीज... दूसरे शहरों में जाकर बस गए सात परिवार
इसी दंगे के कारण सात परिवारों को घर की दहलीज छोड़कर दूसरे शहरों में जाकर बसना पड़ा। दहशत का आलम यह है कि इतना समय बीतने के बाद भी वह फिर से गांव में आने को तैयार नहीं हैं।

परिवार में बचे थे अब्दुल सत्तार और उसकी बहन
दंगे के दौरान लगभग 63 लोगों की मौत हुई थी। इनमें अब्दुल सत्तार के परिवार के भी 11 लोग शामिल थे। जिस समय दंगा हुआ, उस वक्त अब्दुल सत्तार घर पर नहीं था और उसकी बहन अपनी नानी के घर गई थी। 

घर पर परिवार के अन्य सदस्य थे। दंगे में उसके परिवार के 11 सदस्यों की हत्या कर दी गई थी, जिनके शव कुएं में पड़े मिले थे। इस नरसंहार के बाद अब्दुल सत्तार और उसकी बहन ने गांव छोड़ दिया था। वह मकान बेचकर गाजियाबाद में जाकर रहने लगे। 

1987 Maliana Massacre: biggest custodian killing after independence, victims were helpless
मलियाना नरसंहार - फोटो : अमर उजाला
छीन ली थी कैमरे की रील, नहीं खींचने दिए फोटो 
वरिष्ठ छायाकार मुन्ना खान बताते हैं कि घटना के बाद वह अपनी टीम के साथ वहां पहुंचे। हर गली में खून से लथपथ शव पड़े थे। अखबार की कवरेज के लिए काफी फोटो भी खींच लिए थे, लेकिन तभी पीएससी के जवानों ने उन्हें रोक लिया और कैमरे की रील छीनकर उसे नष्ट कर दिया। आज भी जब उन गलियों से गुजरते हैं तो अक्सर वह मंजर जेहन में कौंध जाता है।

दुकान में आग लगाई और लूटपाट की
दंगा पीड़ित वकील अहमद का कहना है कि दंगे के समय उनके हाथ और कमर में गोली लगी थी। उनकी आंखों के सामने कई लाशें थीं। दूसरे वर्ग के जिन लोगों के साथ वह लंबे समय से रह रहे थे, वही लोग उनसे नफरत कर रहे थे। इसी दंगे में रेलवे रोड पर उनकी एक दुकान को भी आग लगाकर लूटपाट की गई थी। इसकी रिपोर्ट की प्रति आज भी उनके पास है। इस दौरान किसी ने भागकर तो किसी ने छिपकर जान बचाई। 
विज्ञापन
विज्ञापन
1987 Maliana Massacre: biggest custodian killing after independence, victims were helpless
मलियाना नरसंहार - फोटो : अमर उजाला

लोनी में बस गया सरताज का परिवार
सरताज और उसका परिवार भी दंगाइयों से प्रभावित रहा। दंगा शांत होने के बाद सरताज और परिवार के अन्य सदस्य गांव छोड़कर चले गए थे, जो लोनी में जाकर बस गए। हालांकि वह कभी-कभी गांव में आते हैं, लेकिन जैसे ही गांव की उन गलियों से गुजरते हैं तो आंखें नम हो जाती है। दंगे से पीड़ित परिवार वो मंजर आज तक नहीं भूल पा रहे हैं। इन परिवारों के अलावा भी चार अन्य परिवार गांव से पलायन कर गए थे। उनके बारे में किसी को जानकारी नहीं है।

विज्ञापन
1987 Maliana Massacre: biggest custodian killing after independence, victims were helpless
मलियाना नरसंहार - फोटो : अमर उजाला

शाहिना ने पेट पर बांधे थे गहने, तलवार से हमलाकर लूट ले गए दंगाई 
मलियाना के रहने वाले इस्तेखार अली ने बताया कि दंगे के दौरान जिस समय लूटपाट हो रही थी, उस वक्त उसकी चचेरी बहन शाहिना ने पेट पर गहने और रुपये बांध लिए थे, ताकि वह सुरक्षित स्थान पर जाकर परिवार की गुजर-बसर कर सके, लेकिन दंगाइयों ने उसे भी नहीं छोड़ा। उसके पेट पर तलवार से वार किया। गहने और रुपये लूटकर ले गए। इसमें शाहिना घायल हो गई थी। दंगे के करीब एक साल बाद उसकी मौत हो गई।

दंगे का नाम सुनते ही उड़ जाती थी नींद
शहर में जब भी दंगा होता था तो उनकी रातों की नींद उड़ जाती थी। वह पूरी रात करवटें बदलते रहते थे। शहर में दंगे का नाम सुनते ही उन्हें डर सताने लगता था कि कहीं दोबारा से उन्हें फंसाकर गिरफ्तार न कर लिया जाए। यह बात मलियाना में नरसंहार के आरोपियों में शामिल रहे आरटीओ पुलिस से रिटायर्ड कालीचरण ने कही।

अगली फोटो गैलरी देखें
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed