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 बेबसी: दूध की खातिर बच्चे को बिलखता देख रही मां, कच्चा अनाज उबालकर खाने की स्थित में पहुंच गए दोआबा के गरीब

Tue, 31 Mar 2020 12:01 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कौशाम्बी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कौशाम्बी Published by: विनोद सिंह Updated Tue, 31 Mar 2020 12:01 AM IST
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Helplessness: The mother watching the child weeping for the sake of milk, the poor people of Doaba reach the position of boiling raw grains
कोरोना वायरस - फोटो : self
‘लॉक डाउन’ की वजह से दोआबा में अब गरीबों की हालत खस्ता होती जा रही है। कहीं मजबूर बाप बच्चों को खिलाकर खुद भूखा सो रहा है, तो कहीं कोई मां इतनी बेबश है कि अपनी आंखों के सामने जिगर के मासूम टुकड़े को दूध की खातिर बिलखता देख रही है।


किसी के पास इलाज कराने को पैसे नहीं हैं तो कोई कच्चा अनाज उबालकर खाने की स्थिति में आ पहुंचा है। कई ऐसे भी परिवार हैं, जिनके पास अब सिर्फ इतना ही राशन बचा है कि बामुश्किल चार से पांच दिन ही पेट की आग बुझ सकेगी। फिर दो जून की रोटी के लाले पड़ जाएंगे। सोमवार को ‘अमर उजाला’ ने जिले के विभिन्न हिस्सों में पड़ताल की तो बेहद भावुक कर देने वाले हालात देखने को मिले। 
Helplessness: The mother watching the child weeping for the sake of milk, the poor people of Doaba reach the position of boiling raw grains
कोरोना वायरस - फोटो : ANI

आठ दिन से दूध को तड़प रहे मासूम

चित्रकूट जिले के बड़गढ़ थाना स्थित कलमुजरा गांव निवासी राजू सिंह व गोविंद सिंह सगे भाई हैं। दोनों करीब पांच महीने से सरायअकिल में परिवार सहित झोपड़ी डालकर रह रहे हैं। जड़ी-बूटी बेचकर इनके परिवार का खर्च चलता था। गोविंद सिंह की पत्नी गौरी ने बताया कि उसकी छह माह की बेटी नैना और दो वर्षीय नीतू दिनभर दूध की खातिर रोती हैं। आठ दिन से बच्चों को ऊपर का दूध नहीं मिला है। दोनों भाइयों ने बताया कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगा, जिसके बाद दो दिन तक किसी तरह काम चल गया।

फिर न राशन बचा न तो पैसे। भाइयों का परिवार चार दिन तक भूखा रहा। इस अवधि में किसी तरह बच्चों के पेट की आग बुझाई गई। आसपास के लोगों से हालत देखी नहीं गई तो उन्होंने थोड़ा बहुत राशन दे दिया। अब सुबह पुलिस खाने का पैकेट दे जाती है तो इससे पहले बच्चों का पेट भरा जाता है। बाकी आधा पेट खाकर भूखे ही जीवन कट रहे हैं। दोनों भाइयों को कुल आठ बच्चे हैं। इसलिए समस्या और भी जटिल है। 

Helplessness: The mother watching the child weeping for the sake of milk, the poor people of Doaba reach the position of boiling raw grains

आदिवासियों सा हो गया जीवन

बिहार प्रांत के औरंगाबाद जिला स्थित दाऊद नगर निवासी सोहराई प्रसाद, कमली देवी, मिथलेश कुमार और  संजू देवी सहित लगभग दो दर्जन परिवारों के लोग महीने भर से कौशाम्बी में टिके हुए थे। ये परिवार सहित यहां रहकर मंझनपुर इलाके के समदा गांव से अर्का जाने वाली सड़क की पटरी बनाने का काम करते थे। कामगारों ने बताया कि सार्वजनिक लोक निर्माण विभाग का ठेकेदार न तो रहने की जगह दे रहा है न खाने को भोजन। उसने फोन भी उठाना बंद कर दिया है।

इस वजह से इन कामगारों के सामने दो जून की रोटी के लाले पड़ गए हैं। लॉक डाउन के बाद दो दिनों तक तो किसी तरह काम चलाया। अब खुद के साथ बच्चों का पेट भरने के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर हो गए हैं। बताया कि किसी रोज कोई रहम नहीं करता तो खेतों से सब्जी तोड़ ले आते हैं। इसी को किसी तरह भूंजकर खा लेते हैं। यूं समझें कि जीवन आदिवासियों सरीखा हो गया है। 

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Helplessness: The mother watching the child weeping for the sake of milk, the poor people of Doaba reach the position of boiling raw grains
कोरोना वायरस - फोटो : सोशल मीडिया

रामचंद्र और आयशा का नहीं है कोई सहारा

स्थानीय कस्बे के आंबेडकर नगर मोहल्ले का रामचंद्र नोएडा स्थित एक ढाबे पर मजदूरी करता था। लॉक डाउन की वजह से रविवार को किसी तरह वह घर चला आया। रामचंद्र की मानें तो मामूली बात पे नाराज होकर पत्नी बच्चों सहित दीपावली पर मायके चली गई थी। रामचंद्र की तबीयत ठीक नहीं है। नोएडा से आते वक्त उसके पास दो हजार रुपये थे। 12 सौ भाड़ा आदि में खर्च हो गए।

अब सिर्फ आठ सौ बचे हैं। इसी से दवा और भोजन दोनों चल रहा है। चूंकि वह नोएडा से आया है, इसलिए पट्टीदार या पड़ोसी उसकी हाल खबर लेने को तैयार नहीं हैं। इसी मोहल्ले की आयशा ने बताया कि उसके पति की डेढ़ साल पहले मौत हो चुकी है। छह बेटियों की शादी हो चुकी है। वहीं खर्च देती थीं। लॉक डाउन के चलते वे भी मिलने नहीं आ पा रही हैं। कोई मदद को तैयार नहीं है। कोटे का जो राशन मिलता है, उसी को उबालकर खाकर किसी तरह आयशा पेट भरती है। 
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कोरोना वायरस - फोटो : Social Media

खून के आंसू रो रहीं रेशमा और गंगा

स्थानीय बाजार निवासी गंगा देवी ने बताया कि उसके पति गंगादीन की तबीयत खराब है। लॉक डाउन के पहले से ही वह जिला अस्पताल में भर्ती है। दवा कराने के लिए पैसे का इंतजाम छोड़िए, पति से मिलने जाने तक का जुगाड़ नहीं है। आर्थिक हालत ऐसी है कि कोटे के राशन को उबालकर गंगा अपना और दो बच्चों का पेट भर रही है। उसमें सिर्फ नमक भर डालती है। बाकी तेल आदि है ही नहीं कि तहरी तक बना सके। वहीं रेशमा ने बताया कि उसकी छोटी-छोटी तीन बेटियां हैं। हालत यह हो गई है कि पेट पालने के लिए दंपति को बिरादरी की बस्ती में हर रोज हाथ फैलाना पड़ता है। यहां के विजय शंकर व महिपाल के सामने भी दो जून की रोटी के लाले पड़ गए हैं। दोनों का कहना है कि पड़ोसियों या समाजसेवियों ने भोजन का पैकेट नहीं दिया तो भूखे मर जाएंगे। 

अब बस तीन दिन को बचा है राशन

इलाके के तिलगोड़ी गांव निवासी राजेन्द्र ने बताया कि वह लाई-चने की भुंजाई करके परिवार का खर्च चलाता था। पत्नी सरोज देवी मजदूूरी करती थी। छोटे-छोटे दो बच्चे हैं। जो रकम रखी थी अब वह खर्च हो चुकी है। घर में तीन दिन के राशन का और जुगाड़ है। जबकि लॉक डाउन 14 अप्रैल तक रहेगा। इस स्थित में ये परिवार भी भूखों मरने की नौबत पर आ जाएगा। राजेन्द्र ने बताया कि उसने ससुराल से आर्थिक मदद मांगी है। रुपये मिल गए तो ठीक है अन्यथा दूसरों के सामने हाथ फैलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा।
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