बेबसी: दूध की खातिर बच्चे को बिलखता देख रही मां, कच्चा अनाज उबालकर खाने की स्थित में पहुंच गए दोआबा के गरीब
आठ दिन से दूध को तड़प रहे मासूम
चित्रकूट जिले के बड़गढ़ थाना स्थित कलमुजरा गांव निवासी राजू सिंह व गोविंद सिंह सगे भाई हैं। दोनों करीब पांच महीने से सरायअकिल में परिवार सहित झोपड़ी डालकर रह रहे हैं। जड़ी-बूटी बेचकर इनके परिवार का खर्च चलता था। गोविंद सिंह की पत्नी गौरी ने बताया कि उसकी छह माह की बेटी नैना और दो वर्षीय नीतू दिनभर दूध की खातिर रोती हैं। आठ दिन से बच्चों को ऊपर का दूध नहीं मिला है। दोनों भाइयों ने बताया कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगा, जिसके बाद दो दिन तक किसी तरह काम चल गया।
फिर न राशन बचा न तो पैसे। भाइयों का परिवार चार दिन तक भूखा रहा। इस अवधि में किसी तरह बच्चों के पेट की आग बुझाई गई। आसपास के लोगों से हालत देखी नहीं गई तो उन्होंने थोड़ा बहुत राशन दे दिया। अब सुबह पुलिस खाने का पैकेट दे जाती है तो इससे पहले बच्चों का पेट भरा जाता है। बाकी आधा पेट खाकर भूखे ही जीवन कट रहे हैं। दोनों भाइयों को कुल आठ बच्चे हैं। इसलिए समस्या और भी जटिल है।
आदिवासियों सा हो गया जीवन
बिहार प्रांत के औरंगाबाद जिला स्थित दाऊद नगर निवासी सोहराई प्रसाद, कमली देवी, मिथलेश कुमार और संजू देवी सहित लगभग दो दर्जन परिवारों के लोग महीने भर से कौशाम्बी में टिके हुए थे। ये परिवार सहित यहां रहकर मंझनपुर इलाके के समदा गांव से अर्का जाने वाली सड़क की पटरी बनाने का काम करते थे। कामगारों ने बताया कि सार्वजनिक लोक निर्माण विभाग का ठेकेदार न तो रहने की जगह दे रहा है न खाने को भोजन। उसने फोन भी उठाना बंद कर दिया है।
इस वजह से इन कामगारों के सामने दो जून की रोटी के लाले पड़ गए हैं। लॉक डाउन के बाद दो दिनों तक तो किसी तरह काम चलाया। अब खुद के साथ बच्चों का पेट भरने के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर हो गए हैं। बताया कि किसी रोज कोई रहम नहीं करता तो खेतों से सब्जी तोड़ ले आते हैं। इसी को किसी तरह भूंजकर खा लेते हैं। यूं समझें कि जीवन आदिवासियों सरीखा हो गया है।
रामचंद्र और आयशा का नहीं है कोई सहारा
स्थानीय कस्बे के आंबेडकर नगर मोहल्ले का रामचंद्र नोएडा स्थित एक ढाबे पर मजदूरी करता था। लॉक डाउन की वजह से रविवार को किसी तरह वह घर चला आया। रामचंद्र की मानें तो मामूली बात पे नाराज होकर पत्नी बच्चों सहित दीपावली पर मायके चली गई थी। रामचंद्र की तबीयत ठीक नहीं है। नोएडा से आते वक्त उसके पास दो हजार रुपये थे। 12 सौ भाड़ा आदि में खर्च हो गए।अब सिर्फ आठ सौ बचे हैं। इसी से दवा और भोजन दोनों चल रहा है। चूंकि वह नोएडा से आया है, इसलिए पट्टीदार या पड़ोसी उसकी हाल खबर लेने को तैयार नहीं हैं। इसी मोहल्ले की आयशा ने बताया कि उसके पति की डेढ़ साल पहले मौत हो चुकी है। छह बेटियों की शादी हो चुकी है। वहीं खर्च देती थीं। लॉक डाउन के चलते वे भी मिलने नहीं आ पा रही हैं। कोई मदद को तैयार नहीं है। कोटे का जो राशन मिलता है, उसी को उबालकर खाकर किसी तरह आयशा पेट भरती है।