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90 प्रतिशत विलुप्त हो चुकी गौरैया, "फिर से चहचहा उठेंगे आंगन" अगर इस महिला की तरह आप भी जाग जाएं

Tue, 20 Mar 2018 02:42 PM IST
शिखा पांडेय, कानपुर
शिखा पांडेय, कानपुर Updated Tue, 20 Mar 2018 02:42 PM IST
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गैरैया संरक्ष के लिए श्रृद्धा कुलश्रेष्ठ की पहल - फोटो : शिखा पाण्डेय
घरेलू गौरैया से हम सभी परिचित हैं। बचपन से अपने आंगन में फुदकती गौरैया को देखकर नैसर्गिक आनंद प्राप्त होता था। सूचना क्रांति के इस युग में हमारे बच्चे उससे वंचित होते जा रहे हैं। गौरैया की प्रजाति लगभग 90  प्रतिशत विलुप्त हो चुकी है। हमारे घर-आंगन से गौरैया के विलुप्त होने के हम भी बराबर के दोषी हैं। जानें कैसे कर सकते हैं नन्ही चिड़िया गौरैया का संरक्षण... 



 
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गौरैया संरक्षण के लिए शुरू किया गया अभियान 
नन्ही चिड़िया गौरैया के संरक्षण के लिए कानपुर शहर से एक अभियान शुरू किया गया। जिसका नाम स्वीट स्पैरो कम बैक होम रखा गया। अभियान की शुरुआत सितंबर 2014 में की गयी। अभियान संयोजक गौरव बाजपेई ने बताया कि अब तक लगभग 80 स्कूल, कॉलेजों ने गौरैया के संरक्षण की मुहिम में हिस्सा लिया है। इस मुहिम से जुड़ने वाले छात्र छात्राओं की संख्या 50000 के करीब है। इस अभियान के तहत 5000 घोसले कानपुर व अन्य शहरों में लगवाए गएं हैं। मुहिम से कानपुर के अलावा कानपुर देहात, भोपाल, उन्नाव, तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा भी जुड़ चुका है। 
 
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गौरैया के लिए लगाएं घरौंदे
गौरैया के ये लकड़ी के घोसले, गौरैया के अंडे और छोटे बच्चों को ऊंचाई से गिरने से बचा लेते हैं। ऊंचाई से असुरक्षित जगह से गिर जाने के कारण गौरैया के 70% तक अंडे टूट जाते हैं और फिर बच्चे गिर कर मर जाते हैं, जो कि इन घोसलों के कारण बच रहे हैं। 
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पहले झुण्ड में पायी जाती थी गौरैया 
20 वर्ष पहले तक गौरैया 200- 400 तक के झुंडों में पाई जाती थी। पुराने मकानों में मुकवे और मोटी दिवालो के कारण इन्हें आसानी से घोसले बनाने की जगह मिल जाती थी।
अब दीवालें 5 इंच की बनती है और उसमे ऊपर से प्लास्टर भी होता है इस वजह से दिवालों में घोसला बनाने की संभावना खत्म हो जाती है। इस कारण से दुनिया की एक मात्र घरेलू चिड़िया ने घरों में घुस कर तस्वीर के पीछे, सीलिंग फैन के ऊपर बने कप में, मीटर बॉक्स में घोसले बनाना शुरू किया। जहाँ से इनके अधिकतर अंडे और बच्चे गिर कर मरने लगे।
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घने पेड़ जरूर लगाएं 
गौरैया व अन्य सभी चिड़ियों, गिरगिट, गिलहरियों को खुद को और अपने बच्चों को छिपाने के लिए पेड़ों की जरूरत होती ही है नहीं तो बाज, बिल्ली, कौवे इन्हें या इनके बच्चों को शिकार बना लेते हैं। गौरैया पेड़ों पर अक्सर घोसले नहीं बनाती सिर्फ अपने और अपने बच्चों को छिपाने के लिए उसे कनेर, अनार, बोगन बेलिया, शमी, मालती की बेल, बेर, नींबू, शहतूत, करेन्डोला, फाइकस, मनोकामिनी जैसे घने कांटेदार झाड़ों की जरूरत होती है। अन्य छोटी चिड़ियों उनके बच्चों के लिए भी यही पेड़ उन्हें सुरक्षा प्रदान करते हैं। 
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