लड़की की मांग का सिंदूर नहीं मिटाया तो जहर देकर मारने का हुआ प्रयास, जानिए कैसे आम इंसान बना डकैत
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बेहमई, भिंड सहित कई बड़े कांड को अंजाम दे चुके लाखन सिंह बघेल ने बताया कि वह ललितपुर पत्थर उद्योग में नौकरी करते थे। गांव के कुछ दबंगों से उनका जमीन को लेकर विवाद था। दबंगों ने उनपर झूठा मुकदमा लिखवाकर जेल भिजवा। पुलिस, नेताओं सबके सामने गुहार लगाई लेकिन किसी ने मदद नहीं की। जमानत पर जेल से छूटे तो फिर से विरोधियों ने साजिश रचना शुरू कर दी। फिर उन्होंने बीहड़ का रास्ता अपना लिया।
बंदूक उठा ली और गैंग बना लिया। उनके समाज की एक लड़की ने ठाकुर लड़के से शादी कर थी। पंचायत ने लड़की का सिंदूर मिटाने के लिए कहा लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। फिर ठाकुरों ने मुझे और मेरे गैंग को जहर देकर मारने की कोशिश की। बचने के बाद मैंने 11 ठाकुरों को मार गिराया। फूलन देवी की मदद के लिए बेहमई कांड को अंजाम दिया। इसके बाद से एक के बाद एक, हर उस शख्स को मारते गए जो गरीब और शोषित लोगों को परेशान करता था।
सरकार की नजरों में हम डाकू थे लेकिन लोगों की नजरों में अच्छे इंसान। सरकार ने मुझपर एक लाख 30 हजार रुपये का इनाम घोषित कर दिया। 1982 में मैंने आत्मसमर्पण कर दिया। जेल हुई और कोर्ट ने फांसी की सजा सुना दी। प्रधानमंत्री ने फांसी की सजा माफ कराते हुए मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया। अब वह अपने परिवार संग खुश हैं। बेटा खेती-किसानी करके परिवार चलाता है और मैं समाजसेवा करता हूं।
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 70 हजार रुपये के इनामी डाकू रहे चित्रकूट के दीपक पटेल ने बताया कि उनके बड़े भाई अंबिका प्रसाद पटेल उर्फ ठोकिया डाकू थे। भाई के डाकू होने की वजह से पुलिस अक्सर घर पर दबिश देती थी और घरवालों को परेशान करती थी। पिता रामस्वरूप पटेल ने खराब माहौल से मुझे दूर रखने के लिए सात वर्ष की उम्र में ही मुझे रायबरेली रिश्तेदारों के यहां भेज दिया।