कानपुर में दिसंबर के अंत में यूपी बोर्ड की प्रयोगात्मक परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं। इस बार हाईस्कूल में विज्ञान और गृह विज्ञान के प्रैक्टिकल के लिए बाहरी परीक्षक आएंगे। शहर के कई अनुदानित स्कूलों में प्रयोगशालाओं की स्थिति दयनीय है। जिस प्रयोगशाला में बच्चों को विज्ञान के प्रयोग करने चाहिए, वहां उपकरण धूल फांक रहे हैं और मकड़ी के जाले व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं। कहीं लैब के नाम पर एक कमरा है तो कहीं केमिकल और उपकरण इतने पुराने हैं कि उनका इस्तेमाल करना भी जोखिम भरा है।
लैब की इन बदहाल व्यवस्था ने स्कूलों की मुश्किल बढ़ा दी है। अनुदानित स्कूलों में सबसे बड़ी समस्या बजट की है। शिक्षकों के वेतन के अलावा स्कूलों को मूलभूत सुविधाओं और प्रयोगशालाओं के रखरखाव के लिए पर्याप्त बजट नहीं मिलता। आठवीं तक शिक्षा निशुल्क होने के कारण छात्रों से फीस नहीं ली जा सकती है। 9वीं से 12वीं तक भी फीस बेहद कम है। इससे बिजली, लैब उपकरण, केमिकल और दूसरी जरूरतों का खर्च निकालना मुश्किल होता है। शिक्षकों का कहना है कि कई बार प्रैक्टिकल के लिए उन्हें अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं।
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स्कूल की लैब के बाहर टूटा पडा फर्श
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केस- 1
महात्मा गांधी गोपी नाथ हायर सेकेंडरी स्कूल में कक्षा छह से लेकर 10 तक में 50 बच्चे पंजीकृत हैं। हाईस्कूल में 11 छात्र हैं। 50 बच्चों के पढ़ने के लिए दो कमरे हैं। शिक्षक सात हैं। बिजली, शौचालय की व्यवस्था नहीं है। शिक्षकाें ने अपने पैसे जोड़कर सोलर बैटरी के माध्यम से बिजली की व्यवस्था की है। प्रैक्टिकल लैब के नाम पर एक कमरा है। यह कमरा ही स्टाफ रूम है। आधे हिस्से में प्रैक्टिकल के कुछ उपकरण रखे हैं जिसमें धूल की मोटी परते जमा है। यह स्थिति साफ बयां करती है कि वर्षों से स्कूल में प्रैक्टिकल नहीं हुआ है। ऐसा हो भी कैसे, जब उपकरण खरीदने और प्रयोगशाला दुरुस्त करने के लिए बजट ही नहीं है। परीक्षाओं के समय शिक्षक पैसे एकत्र कर थोड़ा बहुत सामान लाकर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं।
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गांधी स्मारक इंटर कॉलेज में धूल खा रहे केमिस्ट्री-फिजिक्स लैब
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केस- 2
गांधी स्मारक इंटर कॉलेज, गोविंदनगर में भी प्रैक्टिकल लैब की हालत बेहद जर्जर है। लैब तक पहुंचने का रास्ता भी खतरनाक है। छतों का प्लास्टर कई जगह से टूटा तो कई जगह से जर्जर है। स्कूल के कर्मचारियों ने बताया कि हाल ही में लैब में प्रैक्टिकल हुए हैं लेकिन स्थिति देखकर लगा कि लैब जमाने से खुली ही नहीं है। उपकरण, केमिकल इतने पुराने हैं कि यदि छात्र ने प्रयोग किया भी है तो जरूरी नहीं कि उसका परिणाम सही आया हो।
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गांधी स्मारक इंटर कॉलेज में धूल खा रहा लैब का सामान
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15 साल बाद बदला परीक्षक का नियम
बोर्ड ने करीब 15 साल बाद हाईस्कूल के प्रैक्टिकल की व्यवस्था में बदलाव किया है। अब विज्ञान और गृह विज्ञान के प्रैक्टिकल के लिए बाहरी परीक्षक आएंगे। अभी तक स्कूल के शिक्षक ही छात्रों का प्रैक्टिकल लेकर अंक देते थे। इंटरमीडिएट की तर्ज पर हाईस्कूल के प्रैक्टिकल की तिथि भी जारी की जाएगी और उसी के अनुसार परीक्षा होगी। अब सवाल यह है कि इन अव्यवस्थाओं के बीच बाहरी परीक्षकों की मौजूदगी में छात्रों के प्रैक्टिकल कैसे कराए जाएंगे।
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गोविंद नगर स्थित गांधी स्मारक इंटर कॉलेज
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अनुदानित कई स्कूलों की प्रयोगशालाओं की स्थिति ठीक नहीं है। कई बार स्कूलों को चेतावनी भी दी गई है। अपनी दिक्कतों को दूर करने के लिए अनुदानित स्कूल के प्रबंधकों को अपनी आय के स्त्रोत बढ़ाने होंगे, ताकि वे स्कूलों की जरूरतों को पूरा कर सकें। प्रबंधक अगर विद्यालय की परेशानियों को दूर करने का प्रयास करेंगे, तो निश्चित ही उनके यहां छात्र संख्या भी बढ़ेगी। -प्रवीण कुमार, डीआईओएस