मुल्क की आजादी के लिए आजादी के दिवानों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। आजादी के दिवानों में एक बड़ा नाम मौलाना हसरत मोहानी का भी है। हसरत का जन्म 1875 में मोहान जिला उन्नाव में हुआ। मोहानी ने अपनी जिंदगी का लंबा समय कानपुर में ही गुजारा। इंकलाब जिन्दाबाद का नारा सबसे पहले हसरत मोहानी ने बुलंद किया।
प्रेस एक्ट में सजा पाने वाले पहले पत्रकार हैं मोहानी
मोहानी ने अलीगढ़ से शिक्षा हासिल की और वहीं से कानपुर आ गए। उन्होंने आजादी की दास्तान को अपनी कलम से बयां करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कई बार जेल गए और सजा भी काटी लेकिन आजादी के लिए दीवानगी नहीं छोड़ी। मोहानी अंग्रेजों के शासनकाल में प्रेस एक्ट के तहत सजा पाने वाले पहले पत्रकार भी हैं।
हसरत मोहानी मार्ग है मेस्टर रोड का नाम
मोहानी जब आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे तब जेम्स मेस्टन ने हसरत पर जुल्म किए। आज मेस्टन रोड जेम्स मेस्टन के नाम से ही जाना जाता है, जबकि इसका नाम हसरत मोहानी मार्ग जमाने पहले ही हो चुका था। लोग वर्ष में दो बार 26 जनवरी और 15 अगस्त के मौके पर मोहानी जी को याद तो करते हैं लेकिन विडंबना है कि हसरत मोहानी मार्ग को आज तक पहचान नहीं मिल पायी है। आजादी के वर्षों बाद भी मोहानी मार्ग को लोग मेस्टर रोड ही कहते हैं।
जब मोहानी को प्रेस एक्ट में मिली सजा
मोहानी जी बेखौफ हो अपनी कलम की ताकत का प्रयोग करते थे। कभी भी उन्होंने अपनी कलम के साथ समझौता नहीं किया। खुद हाथ से लिखते और फिर पत्थर वाली अपनी प्रेस में इसे छापते थे। एक बार उनके पत्र में सरकार की शिक्षा नीति पर लेख छपा। अंग्रेज उसका नाम व सरकार की नितियों के बारे में अन्य जानकारी चाहते थे। मोहानी जी ने बताने से इंकार कर दिया। उन्हें 2 साल कारावास और 500 रूपये जुर्माने की सजा सुनाई गयी।
गजल और कविता को दिया उन्नतशील मार्ग
मौलाना मोहानी ने उर्दू गजल को उन्नतशील मार्ग पर मोड़ दिया। साथ ही उर्दू कविता में महिलाओं के प्रति शुद्ध और लाभप्रद दृष्टिकोण दिखाया। उनकी किताबें कुलियात-ए-हसरत, शरहे कलामे गालिब, नुकाते-ए-सुखन, मसुशाहदाते जिंदा आदि मशहूर हुईं।