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दिव्या हत्याकांड: स्कूल गेट पर बेटी की उंगली छोड़ी तो फिर कभी हाथ न थाम सकी मां 

Wed, 05 Dec 2018 03:59 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Updated Wed, 05 Dec 2018 03:59 PM IST
सार

- पथराई आंखों के सूख चुके आंसुओं के बीच छेड़ी इंसाफ की लड़ाई
- कई उतारचढ़ाव भी देखे, लखनऊ और दिल्ली तक पहुंचाई आवाज
 

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Divya murder case in kanpur
डेमो पिक
आठ साल पहले 27 सितंबर 2010 में दिव्या के साथ उसके ही स्कूल में दरिंदगी और उसकी मौत हुई थी। इस घटना से आहत मां अब न्याय के मंदिर से इंसाफ की आस लगाए बैठी थी। लंबी लड़ाई में उसने कई उतार चढ़ाव देखे। जांच की लंबी प्रक्रिया का हिस्सा बनी। थाने और कोर्ट के कई चक्कर लगाती रही।


एक मां अपनी फूल सी बच्ची दिव्या को रोज की तरह 27 सितंबर 2010 की सुबह रावतपुर स्थित ज्ञानस्थली स्कूल में छोड़कर जाती है। बच्ची स्कूल में कक्षा-7 की छात्रा थी। दोपहर लगभग एक बजे स्कूल की आया गंभीर हालत में उसे घर के बाहर छोड़कर भाग जाती है। 
Divya murder case in kanpur
डेमो पिक
पड़ोसी उसे अस्पताल ले जाते हैं, लेकिन डॉक्टर उसकी जान नहीं बचा पाते। बेटी की मौत की खबर सुन मां सुधबुध खो बैठती है। मामले में एफआईआर दर्ज होती है, लेकिन पुलिस के लीपापोती वाले रवैये से आक्रोश पनपने लगता है। मामले का खुलासा करते हुए पुलिस पड़ोस के ही एक युवक को जेल भेज देती है।
Divya murder case in kanpur
डेमो पिक
स्कूल प्रबंधन को क्लीनचिट देती पुलिस की रिपोर्ट उसके गले की फांस बन जाती है। सैकड़ों शहरवासी सामाजिक संस्थाओं और सियासी संगठनों के बैनर तले सड़कों पर उतर आते हैं। मामला तूल पकड़ते देख तत्कालीन मुख्यमंत्री ने मामले की सीबीसीआईडी जांच के आदेश दिए थे।
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Divya murder case in kanpur
डेमो पिक
जांच में स्कूल प्रबंधन के दोषी पाए जाने पर प्रबंधक चंद्रपाल, उसके दो बेटों मुकेश और पीयूष व एक कर्मचारी संतोष को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता है। लगभग दो साल तक जेल में रहने के बाद चंद्रपाल, मुकेश और संतोष को हाईकोर्ट से जमानत मिल जाती है।
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Divya murder case in kanpur
डेमो पिक
आरोपियों के खिलाफ कोर्ट आरोप तय करती है, लेकिन कानूनी दांव-पेच में उलझाकर आरोपी मामले को हाईकोर्ट ले जाते हैं। जहां से कुछ दिन के लिए सुनवाई पर रोक लग जाती है। इसके बाद कोर्ट में दोबारा आरोपियों पर आरोप तय किए जाते हैं और गवाही शुरू हो जाती है।
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