बैंकाें काे हजाराे कराेड़ रूपये की चपत लगाने वाले विक्रम काेठारी शहर के इकलाैते काराेबारी नहीं है। बैंक से जुड़े एक अधिकारी बताते हैं कि शहर में 10-12 उद्योगपति ऐसे हैं जो विदेश व्यापार के नाम पर बैंकों को चूना लगा रहे हैं। विक्रम काेठारी उनमें से एक काराेबारी हैं।
{"_id":"5a8c3c404f1c1ba3378b5171","slug":"vikram-kothari-take-loan-from-bank-on-behalf-of-foreign-business","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"जानिए क्याें तमाम बैंक जनता की जमा पूंजी इस उद्योगपति पर लुटा बैठे","category":{"title":"Crime","title_hn":"क्राइम ","slug":"crime"}}
जानिए क्याें तमाम बैंक जनता की जमा पूंजी इस उद्योगपति पर लुटा बैठे
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Tue, 20 Feb 2018 08:49 PM IST
विज्ञापन
विक्रम काेेठारी
विक्रम काेेठारी
विदेशों में फर्जी कंपनियां बना उनमें आपस में ही खरीद, बिक्री दिखाकर विक्रम कोठारी ने बैंकों को खूब चूना लगाया। कोठारी के इस खेल के आगे बैंकों का इंटेलिजेंस भी फेल हो गया। टैक्स चोरी और बेनामी कंपनियों के कारोबारियों की भाषा में इसे हाई-सी सेल (समुद्री रास्ते से बिक्री) का खेल कहा जाता है।
विक्रम काेेठारी
देर सबेर जब इस बात का खुलासा हुआ तो रिजर्व बैंक समेत कोठारी को कर्ज देने वाले समूह (कंसोर्टियम) ने आंखें मूंद लीं। नतीजा ये हुआ कि तमाम बैंक जनता की जमा पूंजी उद्योगपति पर लुटा बैठे। बैंक से जुड़े एक अधिकारी बताते हैं कि शहर में 10-12 उद्योगपति ऐसे हैं जो विदेश व्यापार के नाम पर बैंकों को चूना लगा रहे हैं। उद्योगपति विक्रम कोठारी इनमें से एक हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विक्रम काेेठारी
इसके लिए वे बैंकों से जारी लेटर ऑफ क्रेडिट को जरिया बनाते हैं। विदेश व्यापार में लेटर ऑफ क्रेडिट दो बैंकों के बीच वह समझौता पत्र है जो आपस में इस बात की सहमति जताते हैं कि क्रेता या विक्रेता में किसी को नुकसान हुआ या वह भुगतान नहीं कर पाया तो बैंक खुद इसका भुगतान करेगा। इसी लेटर ऑफ क्रेडिट के जरिए विक्रम कोठारी विदेश में कई तरह के उत्पादों का व्यवसाय करना दिखाते थे।
विज्ञापन
विक्रम काेेठारी
अपने ही जानकारों के नाम की कंपनियां बनाकर उनमें कागजों में माल की बिक्री करते थे। कुछ समय तक तो बैंकों के क्रेडिट का भुगतान करते थे। बाद में क्रेता कंपनी का नुकसान दिखाकर बैंक का भुगतान बंद कर देते थे। खुद तो मुनाफा कमाते थे लेकिन बैंकों को चूना लगता था। लेटर ऑफ क्रेडिट की लिमिट पूरी होने के बाद भी आरबीआई और कंसोर्टियम के अधिकारी इस पर गौर नहीं करते थे। इसी तरह उन्होंने कई बैंकों को 3700 करोड़ से अधिक का चूना लगा दिया।