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क्या राज्यसभा चुनाव दूर कर देगा "राजनीति के इन दो धुर-विरोधियों के बीच की दूरियां!"
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Fri, 23 Mar 2018 09:25 AM IST
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उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले की सियासत में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला एक ऐसा नाम जिसने राजनीति के लगभग सभी रूप देखे। कभी सिरमौर रहा तो कभी चुनाव में जमानत तक जब्त हो गई। आज हम बात कर रहे हैं डॉ अशोक बाजपेई की। कहते हैं कि एक दौर ऐसा भी था जब मुलायम के बेहद करीबियों में शुमार नेताओं में इस नेता का नाम सबसे ऊपर आता था।
नरेश अग्रवाल, अशोक बाजपेई
हरियावां विकास खंड के ग्राम बूढ़ागांव के मूल निवासी डाक्टर अशोक बाजपेई वर्ष 1977 में पहली बार जनता पार्टी के टिकट पर तत्कालीन पिहानी विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे। बाबू बनारसीदास की सरकार में वह राज्यमंत्री भी बनाए गए थे। 1980 के विधानसभा चुनाव में वह हार गए थे, पर 1985 और 1989 के चुनाव में उन्होंने जीत हासिल की थी।
समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के भरोसेमंद लोगों में गिने जाने वाले अशोक बाजपेई को 1989 में प्रदेश कैबिनेट में शिक्षामंत्री बनाया गया था। वर्ष 1991 में हुए विधानसभा चुनाव में उनकी जमानत जब्त हो गई थी।
समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के भरोसेमंद लोगों में गिने जाने वाले अशोक बाजपेई को 1989 में प्रदेश कैबिनेट में शिक्षामंत्री बनाया गया था। वर्ष 1991 में हुए विधानसभा चुनाव में उनकी जमानत जब्त हो गई थी।
अशोक बाजपेई
वर्ष 1993 में सपा बसपा गठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर वह फिर विस पहुंचे थे। वर्ष 1996 और 2002 के चुनाव में भी वह सपा की साइकिल पर सवार होकर लखनऊ पहुंचे। सूबे में मुलायम सिंह यादव की सरकार बनने पर वह पहले खाद्य एवं रसद और फिर कृषि व धर्मार्थ कल्याण विभाग के मंत्री बनाए गए।
2007 के विधानसभा चुनाव में वह हार गए। नए परिसीमन में वह 2012 में सवायजपुर विधानसभा क्षेत्र से सपा प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे, पर पराजित हो गए। 2017 का चुनाव उन्होंने नहीं लड़ा था। वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी ने उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाया था।
2007 के विधानसभा चुनाव में वह हार गए। नए परिसीमन में वह 2012 में सवायजपुर विधानसभा क्षेत्र से सपा प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे, पर पराजित हो गए। 2017 का चुनाव उन्होंने नहीं लड़ा था। वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी ने उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाया था।
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अशोक बाजपेई
बीते वर्ष 19 अगस्त को वह विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे। अब भाजपा ने उन्हें राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया है। डाक्टर अशोक बाजपेई के नाम का चयन राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा प्रत्याशी के तौर पर होने की जानकारी मिलते ही समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई।
सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के अतिकरीबी रहे डाक्टर बाजपेई ने अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए बीते वर्ष अगस्त में सपा छोड़ दी थी। इसके साथ ही उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया था।
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अशोक बाजपेई
19 अगस्त को लखनऊ में उन्हें केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी में डिप्टी सीएम और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य ने पार्टी की सदस्यता दिलाई थी। तभी से माना जा रहा था कि कहीं न कहीं भाजपा उनका समायोजन करेगी। भाजपा ने बाजपेई को पार्टी में आने के छह माह के अंदर राज्यसभा भेजकर रिटर्न गिफ्ट दे दिया है।
भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा के लिए उत्तर प्रदेश से जिन नामों की घोषणा की उसमें से एक नाम सबसे है 'डॉ.अशोक बाजपेई'। शुक्रवार को होने वाले चुनाव में अशोक बाजपेई की जीत लगभग तय मानी जा रही है। हालांकि इसी जिले से हाल ही में बीजेपी में शामिल हुए नरेश अग्रवाल भी हैं जोकि अशोक बाजपेई के धुर-विरोधी भी कहे जाते हैं। नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल विधायक हैं। नितिन समाजवादी पार्टी की टिकट से चुनाव जीत कर विधानसभा तक पहुंचे। कयास ऐसे भी लगाए जा रहे हैं कि नितिन का वोट बीजेपी को मिलना लगभग तय माना जा रहा है।
भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा के लिए उत्तर प्रदेश से जिन नामों की घोषणा की उसमें से एक नाम सबसे है 'डॉ.अशोक बाजपेई'। शुक्रवार को होने वाले चुनाव में अशोक बाजपेई की जीत लगभग तय मानी जा रही है। हालांकि इसी जिले से हाल ही में बीजेपी में शामिल हुए नरेश अग्रवाल भी हैं जोकि अशोक बाजपेई के धुर-विरोधी भी कहे जाते हैं। नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल विधायक हैं। नितिन समाजवादी पार्टी की टिकट से चुनाव जीत कर विधानसभा तक पहुंचे। कयास ऐसे भी लगाए जा रहे हैं कि नितिन का वोट बीजेपी को मिलना लगभग तय माना जा रहा है।