बसपा विधायक उमाशंकर सिंह का शुक्रवार को शविरामपुर (बयासी) श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। बेटे यूकेश ने उन्हें मुखाग्नि दी। विधायक की अंतिम यात्रा शुक्रवार की सुबह 10 बजे खनवर से निकली। भीड़ की वजह से पार्थिव शरीर को घर से बाहर निकालने में मशक्कत करनी पड़ी है। खनवर मोड़ पर जाम लग गया। अंतिम यात्रा जिला मुख्यालय होकर गंगा घाट पहुंची। 40 किलोमीटर की दूरी छह घंटे में पूरी हुई। हर आम-खास ने विधायक को श्रद्धांजलि दी और भावुक होकर कहा कि रसड़ा ने अपना बेटा खो दिया है।
2 of 9
बसपा विधायक उमाशंकर सिंह के बेटे यूकेश सिंह
- फोटो : अमर उजाला
अंतिम यात्रा खनवर से बछईपुर, सलेमपुर, चोगड़ा, कुकुरहां, हजौली होते हुए चिलकहर पहुंची जहां लोगों ने पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। पियरियां में स्कूली बच्चे घंटों सड़क किनारे विधायक की अंतिम झलक पाने के लिए खड़े रहे। अंतिम यात्रा पहुंचते ही कई बच्चों की आंखें नम हो गईं। सिहांचावर, फेफना, कपूरी, सागरपाली, माल्देपुर, बहेरी, चित्तू पांडेय चौराहे पर भी श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया।
3 of 9
बसपा विधायक उमाशंकर सिंह की शव यात्रा
- फोटो : अमर उजाला
बसपा के प्रदेश अध्यक्ष, मंत्री और पूर्व सांसद ने दी श्रद्धांजलि
जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह और पुलिस अधीक्षक ओमवीर सिंह ने खनवर पहुंचकर विधायक उमाशंकर सिंह को श्रद्धांजलि दी। प्रदेश सरकार के मंत्री दिनेश प्रताप सिंह और दयाशंकर सिंह, बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल और पूर्व सांसद धनंजय सिंह सहित तमाम जनप्रतिनिधियों ने पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित किए।
4 of 9
रोते हुए बसपा विधायक उमाशंकर सिंह के मित्र
- फोटो : अमर उजाला
जब मायावती ने कहा-सबने छोड़ा लेकिन उमाशंकर ने नहीं
एक दिन पहले लखनऊ में जो दृश्य सामने आया, वह भारतीय राजनीति में कम ही देखने को मिलता है। सार्वजनिक जीवन में अपनी भावनाओं पर असाधारण नियंत्रण रखने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने श्रद्धांजलि के दौरान नम आंखों और भर्राई आवाज में कहा था कि बहुत लोग मुझे छोड़कर चले गए, लेकिन उमाशंकर सिंह कभी साथ नहीं छोड़े। यह उस विश्वास की सार्वजनिक स्वीकृति थी जिसे उमाशंकर सिंह ने वर्षों की निष्ठा, अनुशासन और संगठन के प्रति समर्पण से अर्जित किया था।
5 of 9
बसपा विधायक उमाशंकर सिंह की शव यात्रा
- फोटो : अमर उजाला
राजनीति को चुनावी मौसम तक सीमित नहीं रखा
यह सवाल आने वाले वर्षों तक चर्चा के केंद्र में रहेगा। जब पूरे प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का जनाधार लगातार सिमट रहा था, तब भी रसड़ा उसके सबसे मजबूत गढ़ के रूप में कैसे कायम रहा? इसका उत्तर सिर्फ जातीय समीकरणों में तलाशना पर्याप्त नहीं होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके केंद्र में स्वयं उमाशंकर सिंह का व्यक्तित्व और उनकी कार्यशैली थी। उन्होंने राजनीति को चुनावी मौसम तक सीमित नहीं रखा। सुबह से देर रात तक लोगों से मिलना, उनकी समस्याएं सुनना, प्रशासनिक स्तर पर समाधान का प्रयास करना, जरूरतमंद परिवारों की मदद, सामाजिक आयोजनों में बिना भेदभाव शामिल होना और हर वर्ग तक सहज पहुंच बनाए रखना उनकी कार्यशैली का हिस्सा था। इसी निरंतर संवाद ने लोगों के मन में उनके प्रति ऐसा विश्वास, अपनापन और भरोसा पैदा किया, जो उनके पूरे राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी पूंजी बन गया। लगातार तीन बार विधायक चुना जाना निश्चित रूप से उनकी बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन उससे भी बड़ी उपलब्धि यह रही कि समय के साथ उनका व्यक्तित्व उनके पद से बड़ा होता चला गया।