भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने का आधारभूत बनी 1857 की प्रथम जंग-ए-आजादी के शुरू होते ही बागपत में क्रांति की मशाल जली। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के दौरान क्रांतिकारियों के लहू से बागपत की धरती लाल हो गई थी। अंग्रेजों के खिलाफ जनपद के क्रांतिकारियों ने जमकर मुकाबला किया था। जिस कारण अंग्रेजों ने जनपद के 29 गांवों को बागी घोषित कर दिया था और क्रांतिकारियों पर खूब सितम बरपाया, लेकिन जिन स्थलों पर क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की रणनीति बनाई थी, वे आज भी 165 साल गुजर जाने के बाद सरकारी मशीनरी की अपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। क्रांति स्थल, गांव और शहीदों के शहादत स्थल गुमनामी में गुम होते नजर आ रहे हैं।
UP: गुजर गए 165 साल, नहीं सुधरे क्रांति स्थल के हालात, अंग्रेजों ने बागपत के 29 गांवों को घोषित कर दिया था बागी
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आज भी खंडहर है पुरानी तहसील
12 मई 1857 को बाबा शाहमल सिंह के नेतृत्व में हजारों क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकुमरानों द्वारा बनाई गई बड़ौत तहसील (जहां आज वर्तमान में पुरानी तहसील के खंडहर स्थित है) को अंग्रेजों से मुक्त कराकर आजाद घोषित कर दिया, लेकिन 165 साल गुजर जाने के बाद भी पुरानी तहसील खंडहर में तब्दील है।
बड़ौत क्षेत्र के सूबेदार नियुक्त हुए थे बाबा शाहमल
थांबेदार यशपाल चौधरी बिजरौल ने बताया कि तत्कालीन बागपत कोतवाल महान क्रांतिकारी वजीर खां और महताब खां के प्रस्ताव पर अंतिम मुगल बादशाह क्रांतिकारी बहादुर शाह जफर ने उस समय बाबा शाहमल सिंह को बड़ौत क्षेत्र का सूबेदार नियुक्त किया।
सिंचाई विभाग के डाक बंगले पर सुनते थे जनता की फरियाद
नगर के सिंचाई बंगले को बाबा शाहमल ने अपना न्यायालय बना लिया था और यही पर वे जनता की समस्याएं सुनते थे। यह बंगला 1857 की क्रांति का एक अहम हिस्सा रहा है। इसमें बाबा शाहमल समेत हजारों क्रांतिकारियों की अनगिनत यादें सिमटी हैं।
जुल्म की कहानी बयां करता है बरगद का पेड़
बिजरौल गांव जहां अमर शहीद बाबा शाहमल का जन्म हुआ, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने और 1857 क्रांति में हिस्सा लेने के कारण अंग्रेजों द्वारा पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया। इसको लेकर अंग्रेजी सरकार ने जुल्म की हद पार कर बिजरौल गांव को बागी करार कर यहां के 32 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर गांव के दक्षिणी छोर पर मौजूद बरगद के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया गया था।