सोलह शृंगार कर सुहागिन महिलाओं ने बृहस्पतिवार को प्रेम के धागों में सौभाग्य की फेरियां लगाईं। मौका था वट-सावित्री व्रत का। व्रत रखकर सुहागिनों ने अखंड सुहाग के लिए भगवान विष्णु की सविधि आराधना की। इस दौरान भगवान विष्णु के रूप में वट वृक्षों की पूजा की गई। कोरोना कर्फ्यू हटने के बाद इस पूजन के लिए घरों से निकली व्रती महिलाओं ने जगह-जगह समूहों में वट की परिक्रमा की।
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वट सवित्री वत्र पर अलोपीदेवी मंदिर में वृक्ष की परिक्रमा कर पूजन करती महिलाएं।
- फोटो : prayagraj
बृहस्पतिवार को वट वृक्षों के नीचे व्रतियों के पहुंचने का सिलसिला सुबह से ही आरंभ हो गया। संगम के अलावा गंगा, यमुना के घाटों पर डुबकी लगाने के बाद सज धज कर महिलाएं वट सावित्री की पूजा के लिए निकलीं। द्रोपदी घाट पर वटवृक्ष की पूजा के लिए अशोक नगर से लेकर सीडीए पेंशन कॉलोनी तक की महिलाएं पहुंची। वहां वट की पूजा के बाद कलावा के धागों से परिक्रमा की जाती रही। इस दौरान पूजा के लिए वटों की छाया में पहुंचने वाली सुहागिनों में से किसी के हाथ में पूजा की थाली तो किसी के हाथ में डलिया दिखी। महिलाओं के साथ परिवार के सदस्य भी पूजा की सामग्री लेकर चल रहे थे। इस दौरान वट वृक्ष के नीचे पूजा कर सावित्री और सत्यवान की प्रतिमाओं की भी प्रतिष्ठापना की गई। फिर, वेदियां सजाकर तरह-तरह के फल, बांस के पंखे, पूड़ी, हलवा, गुलगुला अर्पित किया गया।
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वट सवित्री वत्र पर अलोपीदेवी मंदिर में वृक्ष की परिक्रमा कर पूजन करती महिलाएं।
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गऊघाट के अलावा मुट्ठीगंज, मीरापुर, झूंसी में वट वृक्षों की पूजा के लिए महिलाओं भीड़ लगी रही। महिलाओं ने वट वृक्ष को रोली, सिंदूर लगाने के बाद धूप-दीप जलाया और उसके बाद मिट्टी के पात्र में घर में बनाए गए पकवान और फल अर्पित किया तथा बांस से बने पंखे को डोलाकर हवा दी। पूजा के बाद महिलाओं ने सावित्री और सत्यवान से जुड़ी कथाएं भी सुनीं। पौराणिक मान्यता के अनुसार कभी सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। तभी से सनातनी संस्कृति में सुहागिन महिलाएं इस व्रत को करती आ रही हैं।