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‘जिंदा’ रहने की जद्दोजहदः नागपुर से पैदल पहुंचे प्रयागराज, जाना है गोरखपुर तक

Sat, 28 Mar 2020 12:42 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 28 Mar 2020 12:42 AM IST
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Struggle to be 'alive': Prayagraj arrives on foot from Nagpur, has to go to Gorakhpur
prayagraj news - फोटो : prayagraj

इस समय पूरा देश कोरोना जैसी महामारी से जंग लड़ रहा है। हर तरफ लोग इस प्रयास में हैं कि किसी तरह इस बीमारी से खुद को बचाया जाए। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो खुद को जिंदा रखने के लिए सैकड़ों मील का सफर पैदल ही तय कर रहे हैं। इनकी जद्दोजहद घर पहुंचने की है ताकि उन्हें भूख से न मरना पड़े। 

छह दिन पहले शुरू हुआ सफर अब भी जारी

शुक्रवार दोपहर कीडगंज क्रॉसिंग के पास तीन युवक सड़क पर बैठे मिले। तीनों हाथोें में पिट्ठू बैग लिए हुए थे। पूछने पर एक ने अपना नाम विशाल साहनी निवासी पिपराबसंत, थाना पिपराइच, जनपद गोरखपुर बताया। आगे बताया कि वह और उसके दोनों साथी साहिल व विजयशंकर चौधरी हैदराबाद से आ रहे हैं। पिछले छह दिनों से वह लगातार सफर कर रहे हैं। हैदराबाद से नागपुर एक ट्रेलर में बैठकर आने के बाद वह वहां से पैदल मैहर पहुंचे।

मैहर से पैदल सफर करके वह प्रयागराज पहुंचे हैं। बताया कि तीनों वहीं फर्नीचर फैक्ट्री में काम करते हैं। 20 को जनता कर्फ्यू के एलान के बाद 21 तारीख को वह और फैक्ट्री में काम करने वाले यूपी के करीब 200 युवक हैदराबाद से अपने-अपने घरों को रवाना हुए थे। सोचा था कि एक दिन बाद तो साधन मिल ही जाएगा। लेकिन बंदी की अवधि बढ़ गई। बंदी के चलते भूखा रहना पड़ता, इसलिए घर जाना ही बेहतर समझा। 

Struggle to be 'alive': Prayagraj arrives on foot from Nagpur, has to go to Gorakhpur
prayagraj news - फोटो : prayagraj

‘बच्चों को भूख से तड़पता हुआ कैसे देखें’

पिपराइच के विशाल जैसी कहानी ही ठेला लगाकर अपना व अपने परिवार का पेट पालने वाले अशोक व उसके गांव के 25-30 अन्य लोगों की है। शुक्रवार को खुल्दाबाद के जोगीवीर तिराहे पर सभी पैदल ही जाते मिले। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं व छोटे बच्चे भी थे। पूछने पर अशोक ने बताया कि वह व उसके साथ जा रहे सभी लोग जालौन के रहने वाले हैं। कई साल से शहर में किराये के कमरों में रहकर ठेलों पर समान बेचकर अपना व अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं।

रोज होने वाली कमाई से ही घर का चूल्हा जलता था। 22 मार्च से काम ठप होने के बाद से कई परिवारों को भूखा सोना पड़ रहा है। खुद तो किसी तरह भूख बर्दाश्त कर ली, लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को भूख से तड़पता देख रहा नहीं गया। इसके बाद सभी पैदल ही गांव जाने के लिए निकल पड़े। हालांकि उनकी कहानी सुनने के बाद पीआरवी 94 पर तैनात जवानों ने सूचना दी तो मौके पर एसपी सिटी बृजेश कुमार श्रीवास्तव पहुंच गए। जिन्होंने न सिर्फ उन्हें खाना वितरित कराया, बल्कि लॉकडाउन को देखते हुए सभी को फिलहाल जंक्शन के पास स्थित लॉज में रहने की व्यवस्था भी कराई। 
Struggle to be 'alive': Prayagraj arrives on foot from Nagpur, has to go to Gorakhpur
prayagraj news - फोटो : prayagraj

भूखे रह नहीं सकते, इसलिए जा रहे घर

दोपहर तीन बजे के करीब नए यमुना पुल पर शहर से नैनी की ओर से जाने वाली पैदल लेन पर दो युवक रेलिंग के सहारे बैठे मिले। पूछने पर पता चला कि दोनों यूईंग क्रिश्चियन कॉलेज के छात्र हैं और चित्रकूट स्थित अपने घर के निकले हैं। साधन नहीं मिला तो पैदल ही निकल पड़े। थकान महसूस हुई तो कुछ देर के लिए पुल पर ठहर गए। इनमें से एक ने अपना नाम शिवप्रताप कुशवाहा और दूसरे ने सौरभ कुमार मिश्रा बताया।
 

शिवप्रताप ने बताया कि वह बीए का छात्र है जबकि उसका रूम पार्टनर सौरभ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है। दोनों आर्यकन्या चौराहे के पास किराये के कमरे में रहते हैं। टिफिन सर्विस ले रखी थी लेकिन पिछले छह दिनों से खाना नहीं मिल रहा है। होटल भी बंद हैं, ऐसे में बाहर भी नहीं खा सकते। किसी तरह इतने दिन काटे, लेकिन अब घर पहुंचने के सिवाय कोई रास्ता नहीं दिखता। लगा था कि नए पुल पर शायद कोई साधन मिल जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जब तक कोई साधन नहीं मिलता, पैदल ही आगे बढ़ेंगे। 

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prayagraj news - फोटो : prayagraj

नाकाफी साबित हो रही सरकारी मदद

लॉकडाउन के चलते घरों में फंसे लोगों की मदद के लिए सरकार की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन मौजूदा हालत में यह नाकाफी ही लग रहे हैं। जिला प्रशासन व पुलिस की लगातार कोशिशों के बाद भी कई परिवार ऐसे हैं, जिन्हें राहत की आस देखते हुए कई दिन बीत चुके हैं और अब उनका सब्र का बांध भी टूट रहा है। मुट्ठीगंज के मालवीय नगर में रहने वाले राजेंद्र कुमार वर्मा का भी परिवार इन्हीं में से एक है।

बेटी शिवानी ने बताया कि उसके पिता व भाई साड़ी की दुकान में काम करते थे। लॉकडाउन के बाद से काम बंद है। महीने के आखिरी दिन थे। ऐसे में किसी तरह काम चल रहा था। तीन दिन पहले राशन खत्म हो गया। छह लोगों का परिवार है। अब पैसे भी नहीं। खाद्य आपूर्ति के संबंध में दी गई हेल्पलाइन पर फोन करने पर बताया गया कि राशन कार्ड पर एक अप्रैल से कोटे की दुकानों में फ्री राशन मिलेगा। लेकिन तब तक भूख कैसे मिटेगी, इसका कोई जवाब नहीं मिला। 
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