कुंभ मेले में दूसरे स्नान पर्व यानि पौष पूर्णिमा पर स्नान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ संगम तट पर उमड़ने लगी है। पौष पूर्णिमा पर इस बार ग्रह-नक्षत्रों का दुर्लभ संयोग बन रहा है। ये संयोग कैसै बनता है और इस दिन स्नान से श्रद्धालुओं को क्या लाभ मिलता है। इस बारे में बता रहे हैं प्रयागराज के ग्रह नक्षत्रम् ज्योतिष शोध संस्थान के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय...
आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार पौष पूर्णिमा पर ग्रह पिण्ड चन्द्रमा, ग्रह नक्षत्रों की विशेष स्थिति और सुयोग पर अपनी प्राणदायिनी अमृतमयी किरणों का संचरण कर जल में प्राणदायी उर्जा समाहित करेगा। ग्रह नक्षत्रों की गणना के अनुसार पौष पूर्णिमा के दिन पुष्य नक्षत्र देर रात तक रहेगा। मन, मस्तिष्क एवं जल तत्व को प्रभावित करने वाला चन्द्रमा स्वयं की कर्क राशि में पूर्णिमा के दिन होना अत्यंत प्रभावशाली है।
आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार कर्क राशि के चन्द्रमा से युक्त पूर्णिमा एवं पुष्य नक्षत्र का संयोग, मकर के सूर्य, बुध, वृश्चिक के बृहस्पति, मीन के मंगल के साथ स्नान-दान के पुण्य प्रताप को कई गुना बड़ा रहा है। पौष पूर्णिमा पर्व का विशेष महत्व शास्त्रों में वर्णित है, इस दिन से माघ मास के पवित्र स्नान का शुभारम्भ होता है। कुम्भ में दूर-दराज से आए हुए अधिकांश श्रद्धालु माघ मास में पौष पूर्णिमा से संगम तट पर निवास कर एक महीने का कल्पवास व्रत प्रारम्भ करते हैं तथा कुछ मकर संक्रांति से अगली संक्रांति तक व्रत का संकल्प लेते हैं।
धर्मशास्त्रों में पौष माह की पूर्णिमा को स्नान-दान का विशेष महत्व वर्णित है, जो व्यक्ति पूरे माघ मास के लिए स्नान का व्रत धारण करते हैं वह अपने स्नान का प्रारम्भ पौष पूर्णिमा से शुरू कर माघी पूर्णिमा तक समापन करते हैं। इस दिन स्नान के पश्चात् मधुसूदन भगवान की पूजा-आराधना कर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न किया जाता है, जिससे मधुसूदन की कृपा से मृत्योपरान्त भक्त को स्वर्ग में स्थान मिल सके, ऐसी धार्मिक मान्यताएं हैं। इस दिन सूर्योदय के पूर्व स्नानादि करके भगवान मधुसूदन की एवं उनके पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन एवं आराधना यथा शक्तिदान देने का विधान है।
सायंकाल में सत्यनारायण भगवान की कथा भी होती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार जो इस दिन स्नान करता है वह देव-विमान में बैठकर विहार करने के योग्य हो जाता है। इस स्नान का पुण्य अर्जित करने वाले पुण्यात्मा स्वर्ग में विहार करते हैं, ऐसी हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताएं हैं। संगम के पवित्र जल में प्राणदायिनी शक्ति विद्यमान है, पौष पूर्णिमा के सुअवसर पर ग्रह नक्षत्रों की विशेष स्थिति, चन्द्र आदि ग्रहों के माध्यम से अमृत वर्षा कर स्नान आदि करने वालों को निरोगी काया सहित पुण्य लाभ प्रदान करती है।