यूं तो नागा संन्यासी जीवन भर कड़े नियम-व्रत का पालन करते हैं लेकिन, उनको खुद का श्रृंगार करना भी बेहद पसंद है। यह उनकी नागा परंपरा का ही एक हिस्सा है। इसमें 17 श्रृंगार का जिक्र है। नागाओं का जमावड़ा होने पर परंपरागत श्रृंगार करके ही उसमें शामिल होते हैं। खास तौर से शाही स्नान से पूर्व सभी नागा सन्यासी श्रृंगार के बाद गंगा में डुबकी लगाने जाते हैं।
तस्वीरें: नागा साधुओं की रहस्यमयी दुनिया का बड़ा सच, जानकर नहीं होगा विश्वास
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नागा परंपरा में धूने की भभूत सबसे पवित्र मानी जाती है। नागा साधुओं का जीवन इसी धूना के इर्द-गिर्द ही सिमटा होता है। इसके बगैर उनका डेरा कहीं नहीं जमता। धूना से निकली भभूति नागा संन्यासियों का पहला आभूषण होता है। भगवान शिव का प्रसाद मानकर नागा इसे पूरे शरीर पर मलते हैं। इसके अलावा नागा परंपरा में नख से शिख तक श्रृंगार का प्रचलन है।
नागा साधुओं के मुताबिक भभूति, चंदन का लेप, जटा में पुष्प की माला एवं चंद्रमा, आंखों में काजल, माथे पर लाल रंग की रोली का लेप, रुद्राक्ष का बाजूबंद, कलाई में चांदी का कड़ा, गले में रुद्राक्ष की माला, रोली का त्रिपुंड, कमरपेटी की तरह फूलों की माला, पांव में चांदी का कड़ा, हाथों में चिमटा और डमरू। नागा इसे ही आभूषण मानते हैं।
जटिल है भभूति बनाने की क्रिया
नागा संन्यासी पूरे शरीर पर भभूति लपटने के बाद और भी रहस्यमयी नजर आने लगते हैं लेकिन, यह कोई सामान्य भभूति नहीं होती। बल्कि लंबी क्रिया के बाद तैयार होने वाली एक खास तरह की भभूति होती है। इसे तैयार करने में घंटों लगते हैं। इसे तैयार करने के लिए नागाओं को खासा अभ्यास करना पड़ता है। उसके बाद ही वह इसमें दक्ष हो पाते हैं। भभूति नागा सन्यासियों के सामने हमेशा प्रज्जवलित रहने वाले धूना से बनती है लेकिन, वहां से निकालकर इसे सीधे धारण नहीं किया जाता बल्कि उसे कई विधियों से तैयार किया जाता है।