प्रयाग मेले में नागा साधुओं का मेला लगा हुआ है। स्थानीय लोगों के साथ जो श्रद्धालु बाहर से आ रहे हैं वो भी इन नागा साधुओं की ओर खिंचे चले आ रहे हैं। इन नागा साधुओं के अंदर बहुत से ऐसे रहस्य छुपे हुए हैं जिन्हें जानने के लिए हर कोई उत्सुक है। ऐसे में कहा जा सकता है कि इस कुंभ मेें नागा साधु आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। हम आपको इनके बारें में खास रहस्य बताने जा रहे हैं।
नागा साधु हमेशा नग्न अवस्था में रहते हैं। ये युद्ध कला में माहिर होते हैं। ये विभिन्न अखाड़ों में रहकर अपने गुरु से ज्ञान लेते रहते हैं। इस दौरान इन्हें कठिन तप से होकर गुजरना पड़ता है। इन्हें एकांत पसंद होता है जहां आसानी से भगवान का ध्यान किया जा सके।
किसी भी नागा साधु को लम्बे समय तक ब्रह्मचारी के रूप में रहना होता है, फिर उसे महापुरुष तथा फिर अवधूत बनाया जाता है। अन्तिम प्रक्रिया महाकुम्भ के दौरान होती है जिसमें उसका स्वयं का पिंडदान तथा दण्डी संस्कार आदि शामिल होता है।
यूं तो नागा संन्यासी जीवन भर कड़े नियम-व्रत का पालन करते हैं लेकिन, उनको खुद का श्रृंगार करना भी बेहद पसंद है। यह उनकी नागा परंपरा का ही एक हिस्सा है। इसमें 17 श्रृंगार का जिक्र है। नागाओं का जमावड़ा होने पर परंपरागत श्रृंगार करके ही ये उसमें शामिल होते हैं। खास तौर से शाही स्नान से पूर्व सभी नागा संन्यासी श्रृंगार के बाद गंगा में डुबकी लगाने जाते हैं।
नागा परंपरा में धूने की भभूत सबसे पवित्र मानी जाती है। नागा साधुओं का जीवन इसी धूना के इर्द-गिर्द सिमटा होता है। इसके बगैर उनका डेरा कहीं नहीं जमता। धूना से निकली भभूति नागा संन्यासियों का पहला आभूषण होता है। भगवान शिव का प्रसाद मानकर नागा इसे पूरे शरीर पर मलते हैं। इसके अलावा नागा परंपरा में नख से शिख तक श्रृंगार का प्रचलन है।