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UP: चीखें, सिसकियां और मातम...उंटगन हादसे में 12 की मौत, अंतिम दिन जलीं चार चिताएं; रुला देंगी तस्वीरें
Wed, 08 Oct 2025 09:39 AM IST
धीरेन्द्र सिंह
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Wed, 08 Oct 2025 09:39 AM IST
सार
त्योहार से पहले गांव कुसियापुर में मौत ने ऐसा झपट्टा मारा कि 12 लोगों की जान चली गई। युवाओं से लेकर किशोर उटंगन नदी हादसे में मौत की नींद सो गए। इस हादसे के बाद गांव में मातम पसरा हुआ है।
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उटंगन हादसा
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
खेरागढ़ के गांव कुसियापुर में चामड़ माता के मंदिर पर दुर्गा प्रतिमा स्थापना के बाद हंसी खुशी के माहौल पर विसर्जन के दिन हुए हादसे ने परिवारों को दर्द दिया। किसी के घर का चिराग बुझ गया तो किसी की मांग का सिंदूर उजड़ गया। बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया। एक सप्ताह पहले तक जहां मंगलगीत गज रहे थे, वहां पर अब करुण क्रंदन ही सुनाई दे रहा है। गांव के हर घर में लोगों की आंखों में आंसू हैं। हादसे के बाद जिसने भी सर्च ऑपरेशन को देखा वह परिवारों का हाल देखकर रोता नजर आया।
विलाप करते परिजन
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
दीपक की मां बेसुध हो गई, बहन का हाल बेहाल
दीपक चार भाइयों में सबसे छोटा था। उसके पिता की 6 साल पहले बीमारी के चलते मृत्यु हो चुकी है। दीपक का शव सेना के जवानों ने नदी से बाहर निकाला। यह देख नदी किनारे बैठे परिजन में चीख पुकार मच गई। भाई के मिलने के इंतजार में बैठी उसकी बड़ी बहन नीलम दीपक के शव की ओर दौड़ पड़ी। भाई का शव देख वो होश खो बैठी, बेसुध होकर गिर पड़ी। दीपक के बड़े भाई मोनू ने बहन को संभाल कर पानी के छींटे मारे, होश आने पर बस भाई को पुकारे जा रहीं थी। माँ तुलसी देवी रो-रो कर बेसुध गईं। भाई मोनू, सुदामा नन्दकिशोर दीपक को याद कर रोते रहे।
दीपक चार भाइयों में सबसे छोटा था। उसके पिता की 6 साल पहले बीमारी के चलते मृत्यु हो चुकी है। दीपक का शव सेना के जवानों ने नदी से बाहर निकाला। यह देख नदी किनारे बैठे परिजन में चीख पुकार मच गई। भाई के मिलने के इंतजार में बैठी उसकी बड़ी बहन नीलम दीपक के शव की ओर दौड़ पड़ी। भाई का शव देख वो होश खो बैठी, बेसुध होकर गिर पड़ी। दीपक के बड़े भाई मोनू ने बहन को संभाल कर पानी के छींटे मारे, होश आने पर बस भाई को पुकारे जा रहीं थी। माँ तुलसी देवी रो-रो कर बेसुध गईं। भाई मोनू, सुदामा नन्दकिशोर दीपक को याद कर रोते रहे।
विलाप करते परिजन
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
परिवार को संभालना हुआ मुश्किल
गजेंद्र (20) पुत्र रेवती प्रसाद तीन भाईयों में सबसे छोटा था। माँ कमलेश देवी का बेटे की मौत से रो-रो कर हाल बेहाल है। गजेंद्र का नाम लेकर छह दिन से रो रहीं थीं। पड़ोस की महिलायें उन्हें संभाल रहीं है। छोटी बहन आरती फूट-फूट कर रो रही थी। भाइयों जयप्रकाश और यशपाल के आंसू भी नहीं रुक रहे। वो खुद के साथ परिवार को भी संभाल रहे थे। मृतक गजेन्द्र मजदूरी करता था। मां पिता का दुलारा था।
गजेंद्र (20) पुत्र रेवती प्रसाद तीन भाईयों में सबसे छोटा था। माँ कमलेश देवी का बेटे की मौत से रो-रो कर हाल बेहाल है। गजेंद्र का नाम लेकर छह दिन से रो रहीं थीं। पड़ोस की महिलायें उन्हें संभाल रहीं है। छोटी बहन आरती फूट-फूट कर रो रही थी। भाइयों जयप्रकाश और यशपाल के आंसू भी नहीं रुक रहे। वो खुद के साथ परिवार को भी संभाल रहे थे। मृतक गजेन्द्र मजदूरी करता था। मां पिता का दुलारा था।
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विलाप करते परिजन
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
दोनों बेटों को खो दिया
हरेश का शव मिलते ही परिजन में चीख-पुकार मच गई। पिता यादव सिंह पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। उनके दो बेटे थे। दोनों ही उटंगन नदी हादसे का शिकार हो गए। हादसे में उनके दोनों बेटे गगन व हरेश की मौत हो गई। गगन का शव घटना के दिन दिन ही मिल गया था। मंगलवार शाम को हरेश का शव मिला है। घर के दोनों चिराग बुझ जाने से माता-पिता यादव सिंह व प्रेमवती सदमे में है। घर के करुण क्रंदन से गांव में हर कोई रोता नजर आया।
हरेश का शव मिलते ही परिजन में चीख-पुकार मच गई। पिता यादव सिंह पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। उनके दो बेटे थे। दोनों ही उटंगन नदी हादसे का शिकार हो गए। हादसे में उनके दोनों बेटे गगन व हरेश की मौत हो गई। गगन का शव घटना के दिन दिन ही मिल गया था। मंगलवार शाम को हरेश का शव मिला है। घर के दोनों चिराग बुझ जाने से माता-पिता यादव सिंह व प्रेमवती सदमे में है। घर के करुण क्रंदन से गांव में हर कोई रोता नजर आया।
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13 लोगों के नदी में डूबने पर विलाप करते परिजन
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हर गली में पसरा है मातम
कुसियापुर गांव के लोगों का कहना था कि नदी में डूबे 12 युवकों के अपने अलग सपने थे लेकिन उटंगन नदी ने सब कुछ निगल लिया। छह दिन तक चली जद्दोजहद के बाद जब आख़िरी शव बरामद हुआ, तो पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। अपने लाडले बेटे को खोने वाली माताओं की आंखें अपने लाल को खोजती रहीं, बेबस पिता बस नदी की लहरों में उम्मीद तलाशते रहे। जिन गलियों में कभी इन युवाओं की हंसी गूंजती थी, वहां अब मातम पसरा हुआ है। कुसियापुर गांव ने अपने 12 बेटों को खो दिया और साथ ही खो दिए वो अधूरे सपने, जो अब सिर्फ यादों में जिंदा रहेंगे।
कुसियापुर गांव के लोगों का कहना था कि नदी में डूबे 12 युवकों के अपने अलग सपने थे लेकिन उटंगन नदी ने सब कुछ निगल लिया। छह दिन तक चली जद्दोजहद के बाद जब आख़िरी शव बरामद हुआ, तो पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। अपने लाडले बेटे को खोने वाली माताओं की आंखें अपने लाल को खोजती रहीं, बेबस पिता बस नदी की लहरों में उम्मीद तलाशते रहे। जिन गलियों में कभी इन युवाओं की हंसी गूंजती थी, वहां अब मातम पसरा हुआ है। कुसियापुर गांव ने अपने 12 बेटों को खो दिया और साथ ही खो दिए वो अधूरे सपने, जो अब सिर्फ यादों में जिंदा रहेंगे।