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इस दरगाह पर केसरिया लिवास पहनकर सजदा करते हैं लोग, पूरी होती है मन्नत
Tue, 30 Apr 2019 06:14 PM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Tue, 30 Apr 2019 06:14 PM IST
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दरगाह मरकज साबरी
- फोटो : अमर उजाला
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दरगाह मरकज साबरी में केसरिया टोपी, साफा और जुब्बा पहनकर लोग सजदा करते हैं। ये दरगाह पिछले कई सौ सालों से सद्भावना की मिसाल दे रही है। अरब से आए हुक्म को 'सरकार' भारत में भाईचारे का संदेश दे रहे हैं।
दरगाह मरकज साबरी
- फोटो : अमर उजाला
आगरा क्लब में दरगाह मरकज साबरी है। चार सौ से अधिक साल पुरानी इस दरगाह की अपनी अलग ही कहानी है। इस दरगाह के सज्जादानशीं रमजान अली शाह (सरकार) हैं। दरगाह पर इस बार 420वे उर्स का आयोजन हुआ। इस दरगाह पर नेता से लेकर अभिनेता माथा टेकने आते हैं। पूर्व सांसद राजेश पायलट, पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा या फिर फिल्म अभिनेत्री ऋषिता भट्ट। सभी ने मजार पर माथ टेका है।
दरगाह मरकज साबरी
- फोटो : अमर उजाला
दरगाह मरकज साबरी की मान्यता है कि यहां हाथ फैलाकर जिसने भी मन्नत मांगी, उसकी हर तमन्ना पूरी हुई है। दरगाह पर केसरिया लिवास पहनकर सजदा करने की परम्परा देश में सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दे रही है। देशभर के जायरीन यहां अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए धागा बांधते हैं। केसरिया टोपी पहनने पर जायरीनों का मानना है कि उनके पीर इस रंग की टापी (ताज-ए-साबरी) पहनते थे तो उनकी पसंद पूरी करने के लिए केसरिया टोपी, जुब्बा और साफा पहना जाता है।
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दरगाह मरकज साबरी
- फोटो : अमर उजाला
बताते हैं कि सालों पहले पूर्व हजरत अलाउद्दीन अली अहमद साबिर अरब से निकले और फतेहपुर सीकरी पहुंचे। यहां हजरत शेख सलीम चिश्ती के पास रुके। वहां से आगरा पहुंचे और आगरा क्लब में अपना स्थान बनाया। इसके बाद यहां पर दरगाह का सिलसिला शुरू हो गया।
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आगरा क्लब स्थित दरगाह मरकज साबरी
- फोटो : अमर उजाला
आगरा क्लब स्थित हजरत सैयद फतिहउद्दीन बल्खी का 420वां जश्न ए उर्स और सर्वधर्म सम्मेलन रविवार को फातिहा के साथ शुरू हुआ था। इस दौरान कुरान ख्वानी, फातिहा, महफिल ए समां और मीलाद शरीफ के आयोजन हुए। सज्जादानशीन रमजान अली शाह ने रस्में अदा करने के बाद कहा कि इन बुजुर्गों के दरबार से प्रेम और भाईचारे का संदेश प्रसारित किया जाता है। इनके दरबार में कोई छोटा या बड़ा नहीं, कोई धर्म-जाति नहीं होती है। यहां इंसान से इंसान को लाने का प्रयास किया जाता है। ये उसे पांच दिन चलता है। अकीदतमंदों का दरगाह में हाजिरी लगाने का सिलसिला शुरू हो गया है।