ताज महोत्सव के मुक्ताकाशीय मंच पर निजामी बंधु ने सूफियाना कलाम छाप तिलक सब छीनी, मेरे रश्के कमर, तेरी पहली नजर....कव्वाली सुनाकर दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर दिया। देर रात तक सूफी गीत, कव्वाली और बॉलीवुड के नगमों से दर्शकों की वाहवाही लूटते रहे।
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ताज महोत्सव में दर्शक
- फोटो : अमर उजाला
ताज महोत्सव के मुक्ताकाशीय मंच पर बुधवार की रात को चांद निजामी, शादाब व सोहराब फरीदी के पहुंचते ही दर्शकों की भीड़ बढ़ने लगी। निजामी बंधु ने कोई पुकारे अल्लाह तुझको, कोई कहे भगवान, जिसके मन को जैसा भाए, वैसा तेरा नाम, हाथ खुले तो अल्लाह, हाथ जुड़े तो राम...से शुरुआत की। इसके बाद अमीर खुसरो का कलाम छाप तिलक सब छीनौ, तोसे नैना...पेश करके महफिल को ऊंचाइयों को पहुंचाया। दमादम मस्त कलंदर.... सुनाकर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
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ताज महोत्सव में निजामी बंधु
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बजरंगी भाईजान में गाई कव्वाली भर दो झोली या मोहम्मद.... और फिल्म राक स्टार में गाई कव्वाली कुन फाया कुन फाया...पेश कीं। दर्शकों के फरमाइश करने पर उन्होंने मेरे रश्के कमर तेरी पहली नजर सुनाई तो पंडाल मेें मौजूद दर्शकों ने नाचना शुरू कर दिया। हर कोई मंच के पास जाकर मेरे रश्के कमर पर नाचने को उतावला था। इसके बाद उन्होंने घर आजा नादां परिंदे..जैसे कई नगमे पेश किए। संचालन सुशील सरित ने किया।
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निजामी बंधु की कव्वाली से शाम हुई खुशरंग
- फोटो : अमर उजाला
आगरा से हमारा गहरा नाता: निजामी बंधु
ताज महोत्सव में प्रस्तुति देने आए निजामी बंधु चांद निजामी ने कहा कि वह पहली दफा ताज महोत्सव में प्रस्तुति देने आए हैं। यूं तो आगरा से गहरा नाता है। आगरा घराना उनकी ननिहाल है। शिल्पग्राम में चांद निजामी, उनके भतीजे शादाब व सोहराब फरीदी के साथ ही बेटे गुलफाम निजामी के साथ पहुंचे। चांद निजामी ने बताया कि आगरा बहुत मारूफ व मशहूर जगह है। यहां से उनका गहरा ताल्लुक है। आगरा घराने के उत्साद अकील अहमद खां, उस्ताद शब्बीर हुसैन साहब उनके मामा हैं। उन्होंने बताया कि पिछले माह वह आगरा किले में प्रस्तुति दे चुके हैं। आगरा के लोग अच्छा सुनने वाले हैं।
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ताज महोत्सव
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आजकल बजरंगी भाईजान, राक स्टार की कव्वाली भी लोग पसंद कर रहे हैं। वह खासतौर से कव्वाल हैं मगर अमीर खुसरो, बुल्ले शाह के कलाम पेश करने में भी लुत्फ आता है। उन्होंने आज के हालात पर शेर सुनाया ‘आमाल तो सारी दुनिया के अल्लाह बेहतर जाने है, हर फूल की रंगत समझे है, हर कली की खुशबू पहचाने है। ये राम रहीम के मतवाले, क्या भाषा के लिए लड़ते क्या लड़ते हो, अल्लाह भी हिंदी जाने है, राम भी उर्दू जाने है। महोत्सव में दर्शकों की कम संख्या पर उन्होंने कहा कि सुनने वालों को सलीका होना चाहिए, फिर चाहे दो लोग ही सुनने वाले क्यों नहीं हों।