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मां बनी संबल: मातृशक्ति के आगे कोरोना भी टिक न पाया, ड्यूटी के साथ निभा रहीं ममता का फर्ज

Mon, 10 May 2021 11:21 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Mon, 10 May 2021 11:21 AM IST
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mothers day 2021 mothers caring the family amid corona crisis
मातृ दिवस 2021 - फोटो : अमर उजाला

आप मां हैं तो सभी समस्याओं का समाधान हैं। कोरोना काल में अन्य रिश्तों की डोर में तनाव बढ़ा है लेकिन यह संबंध कुंदन सा चमक रहा है। कोरोना योद्धा मां पर काम बढ़ा है लेकिन वह सब कर्तव्य निभाकर भी अपने बच्चों के लिए समय निकाल रही हैं। जिम्मेदारियों में सामंजस्य बिठा रही हैं। कोरोना से पीड़ित बेटे को सेवा से शक्ति दे रही हैं, अधिकारी बेटे-बेटी को कर्तव्य निभाने का संबल दे रही हैं। 

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रोजाना बच्चों के साथ दौड़ लगाने से शुरू होती है मां की ड्यूटी
पुलिस अधिकारी की ड्यूटी और मां की जिम्मेदारी...बच्चों के लिए समय निकालना मुश्किल होता है। कोशिश करती हूं कि सुबह बच्चों के साथ रहूं। यह कहना है कि एत्मादपुर की सीओ अर्चना सिंह का। उनकी छह साल की बेटी और ढाई साल का बेटा है। पति महेश कुमार सीओ अछनेरा हैं। कोरोना संक्रमण के बीच कानून व्यवस्था से लेकर लोगों की समस्याओं को दूर करने की बड़ी जिम्मेदारी है। सुबह से लेकर रात तक ड्यूटी करनी पड़ती है। लेकिन जब भी समय मिलता है, बच्चों के साथ बिताती हैं। 
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परिवार को संक्रमण से बचाव की जिम्मेदारी भी है। बाहर से आने पर पहले नहाने और कपड़े धोने के बाद ही बच्चों से मिलती हैं। बेटी को पढ़ाती हैं। बेटे के साथ खेलती हैं। बोलीं कि बच्चे उनको देखकर खिलखिलाते हैं तो सारी थकान, तनाव दूर हो जाता है। कोरोना काल में बच्चों की सेहत का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। उनको पौष्टिक आहार मिले इसका ध्यान रखना होता है। अर्चना सिंह बच्चों को अधिक से अधिक फल देती हैं। रोजाना सुबह बच्चों के साथ घर के गार्डन में दौड़ लगाने से मां की ड्यूटी शुरू हो जाती है।

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‘बेटी ने तुतलाते हुए मम्मा बोला, मैं स्वस्थ हो गई’
बाह के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात स्टाफ नर्स शहनाज की डेढ़ साल की बेटी आयरा है। बेटी की देखभाल की जिम्मेदारी संभालने के साथ वह अस्पताल में मरीजों की सेवा की जिम्मेदारी भी बखूबी संभाल रही हैं। तीन सप्ताह पहले अपना फर्ज निभाते हुए वह कोरोना संक्रमित हो गईं। सभी घबरा गए थे। 

उन्होंने बताया कि होम आइसोलेशन के दौरान आयरा रोजाना कमरे के दरवाजे पर तुतलाती आवाज में मम्मा बोलते हुए बातें करती और मैं शक्ति से भर जाती। संक्रमण का डर भाग जाता। बेटी के कहे ‘मां’ शब्द की शक्ति से वह पूरी तरह से स्वस्थ हो गई हैं। ड्यूटी पर लौट आई हैं। दिनभर अस्पताल में रहना पड़ता है। मन घबराता है, आयरा की याद सताती है तो वीडियो कॉलिंग कर लेती हूं और एक बार फिर तरोताजा महसूस करने लगती हूं। 

‘मां ने दिन-रात एक कर मुझे दूसरी जिंदगी दी है’
जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) कार्यालय के परीक्षा प्रभारी अतुल कुमार संक्रमण से जीत का श्रेय अपनी मां चरन देवी को देते हैं। बोले कि मां ने उन्हें कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। सुबह की चाय से लेकर नाश्ता, खाना, काढ़ा समय-समय पर देतीं और मुझे स्वस्थ कर ही मानीं। 

अतुल कुमार की कोरोना संक्रमण की रिपोर्ट 15 अप्रैल को पॉजिटिव आई थी। वह भावना टॉवर में रहते हैं। उन्होंने बच्चों को भाई के घर भेज दिया। घर में अकेले खुद को आइसोलेट कर लिया। स्वास्थ्य विभाग के चिकित्सकों की सलाह से दवा लेने लगे। इसकी जानकारी मां को मिली तो वह शिकोहाबाद स्थित घर पर थीं। वह अतुल के पास जाने की जिद करने लगी। अतुल कुमार ने कई बार मना किया, पर नहीं मानी। आगरा पहुंच गईं। उसी घर में अलग कमरे में रहते हुए सेवा की। उनके रहते मेरा बाल भी बांका कैसे हो सकता था। 

‘मां है तो फिर किस बात की फिक्र’
आगरा रेल मंडल में अपर मंडल रेल प्रबंधक मुदित चंद्रा की मां किरन चंद्रा उनके साथ ही रहती हैं। संक्रमण काल के तनाव पर बोले कि मां हैं तो फिर किस बात की फिक्र। उन्होंने बताया कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में उनकी मां ने एमए किया है। पीएचडी में दाखिला लिया था, लेकिन बच्चों की परवरिश के लिए इसे पूरा नहीं हो पाईं। आगरा कैंट स्थित ऑफीसर्स कॉलोनी में रहने वाली किरन चंद्रा, अपने बेटे और दो नातिनी की देखभाल करती हैं। मुदित चंद्रा ने बताया कि मां पूरे दिन परिवार की चिंता में रहती हैं। मैंने ऑफिस जाने से पहले नाश्ता लिया या नहीं, बेटियों का होमवर्क हो या कुछ और काम। वह सब देखती रहती हैं। ऐसे में मैं चिंता से मुक्त रहता हूं। 

थाना ताजगंज में तैनात सिपाही पूनम की ढाई साल की बेटी है। उन्होंने बताया कि बेटी के छोटी होने के कारण उसे पहले कई बार ड्यूटी पर ले जाना पड़ता था। मगर, अब कोरोना वायरस का संक्रमण चल रहा है। इस कारण उसे साथ लेकर नहीं जाती हैं। पति भी ड्यूटी पर जाते हैं। शाम को जब वो थाने की ड्यूटी खत्म करके आती हैं तो बच्ची से दूर ही रहती हैं। नहाने के बाद ही बच्ची से मिलती है। इसके बाद उसे खाने-पीने के लिए देती हैं। बेटी को घर से बाहर नहीं जाने देती हैं। उसे घर में खिलौनों से खिलाती हैं।

संक्रमण से बचाने के लिए बच्चों से अलग रह रहीं
एसएन मेडिकल कॉलेज की स्टाफ नर्स आशा राजपूत एक ही शहर में परिवार से दूर रहती हैं। बोलीं कि बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए दिल को कठोर कर लिया। एक महीने से परिवार से अलग रह रही हूं। वीडियो कॉल से बच्चों से बात करती हूं। आशा की ड्यूटी कोविड हॉस्पिटल में है। दोपहर तीन से रात 10 बजे तक ड्यूटी देती हैं। परिवार कालिंदी विहार में रहता है। 

बेटा 10 वर्ष का और बेटी तीन वर्ष की है। फिलहाल पति मुकेश कुमार बच्चों की देखभाल कर रहे हैं। बेटा मां की मजबूरी को समझता है लेकिन बेटी वीडियो कॉल पर देखती है तो रोने लगती है। बहलाती हैं कि चॉकलेट लेकर जल्द आएंगी। आशा पहली लहर में कोरोना संक्रमित हो गई थीं। कई दिन ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहीं। उनका कहना है कि यह संकट की घड़ी है, मां की जिम्मेदारी के साथ मरीजों की देखभाल का दायित्व भी निभाना है।

दिनभर ड्यूटी, सुबह और शाम बच्चों के नाम
थाना हरीपर्वत में तैनात एसआई डेजी पंवार का कहना है कि ड्यूटी पर सुबह से ही जाना होता है। शाम को ड्यूटी पूरी होने पर ही घर आते हैं। उनके दो बच्चे हैं। घर वापस आने पर वह सबसे पहले बच्चों से दूरी बनाती हैं। कपड़ों को सैनिटाइज करने और नहाने के बाद ही कमरे में जाती हैं। इसके बाद बच्चों के साथ समय बिताती हैं। सुबह भी ड्यूटी पर जाने से पहले बच्चों के साथ खेलती हैं। उन्हें खाने में फल से लेकर अन्य जरूरी चीजें देती हैं।
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