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नारी सशक्तिकरण को दर्शाती है ब्रज की लठामार होली, जानिए इस अनोखी परंपरा से जुड़ी रोचक बातें

Thu, 07 Mar 2019 12:49 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा Published by: मुकेश कुमार Updated Thu, 07 Mar 2019 12:49 PM IST
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international women's day history of lathmar holi barsana
लठामार होली खेलतीं हुरियारिन (फाइल) - फोटो : अमर उजाला
'अनुपम होली होत है लट्ठन की सरनाम। अबला सबला सी लगै, बरसाने की वाम...।' दक्षिण के मुदरैपट्टनम से आए नारायण भट्ट के वंशज हरीगोपाल भट्ट की नंदगांव-बरसाना की लठामार होली पर सैकड़ों वर्ष पूर्व लिखी ये पंक्तियां सशक्त नारी के आधुनिक स्वरूप को दर्शाती हैं। विश्व प्रसिद्ध ब्रज की लठामार अपने आप में अनोखा पर्व है। यह पर्व न सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रतीक है बल्कि नारी शक्तिकरण को भी दर्शाता है। जानिए होली की इस अनोखी परंपरा से जुड़ी रोचक बातें...
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लठामार होली खेलतीं हुरियारिन (फाइल)
550 वर्ष पूर्व मुस्लिम शासकों के आतंक से परेशान ब्रजबालाओं को आत्मरक्षा के लिए ब्रजाचार्य नारायणभट्ट ने लाठी उठाने को कहा था। लठामार होली के बहाने महिलाओं ने कृष्णकालीन हथियार (लाठी) उठाकर अपने सम्मान की रक्षा की तैयारियां शुरू कर दीं। नारायण भट्ट की प्रेरणा से ब्रजनारियों ने हाथों में लाठियां तो उठा लीं लेकिन प्रहार किस पर करें यह यक्ष प्रश्न था। इसका भी समाधान निकाला गया कि लठ प्रहार अपने निकटस्थ पर ही किया जाए, क्योंकि अगर अपनों पर भी प्रहार करने में दक्षता हासिल हो गई तो दुश्मन पर प्रहार करना बेहद आसान होगा।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
लठामार होली को लेकर मान्यता है कि द्वापर युग में कान्हा को जब बरसाना में राधा और अन्य सखियों के साथ होली खेलते-खेलते देर शाम हो जाती तो वे उन्हें पुष्पों से सुसज्जित छड़ियों से भगाती थीं। कान्हा और उनके सखा उन छड़ियों के प्रहार को कनक (सोना) पिचकारियों से रोकते थे। कालांतर में पुष्प सुसज्जित छड़ियां लाठियों में और कनक पिचकारी ढालों में तब्दील हो गईं।  
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लठामार होली खेलतीं हुरियारिन (फाइल)
वसंत पंचमी से ही ब्रज मंडल में फाग की खुमारी चढ़ जाती है। बरसाना-नंदगांव में अमावस्या के बाद आने वाली नवमी और दसवीं को लठामार होली का आयोजन होता है। सोलह श्रृंगार से सुसज्जित, लहंगा चुनरी पहने, हाथों में चमचमाती लाठियां लिए गोपिकाओं को हुरियारिन कहा जाता है। धोती बगल बंदी और पाग बांधे भंग की तरंग में झूमते हुरियारे इन लाठियों के प्रहारों का बचाव चमड़े की बनी ढाल से करते हैं। बरसाना में आयोजित लठामार होली में नंदगांव के हुरियारे और बरसाना की हुरियारिन होती हैं। 
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बरसाना में लठामार होली (फाइल)
हिंदी साहित्यकार एवं नंदगांव के हुरियारे रामशरण शर्मा ने बताया कि नंदगांव बरसाना की परंपरागत लठामार होली महिला सशक्तिकरण का अद्वितीय उदाहरण है। ब्रज में तमाम प्रकार की होली का चलन है। कनक पिचकारियों से शुरू हुई होली आज लठामार होली के रूप में जग विख्यात है। 
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