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लॉकडाउन: घर लौटे मेहनतकश मजदूर की कहानी, दो साल की जमा मजदूरी सिर्फ 490 रुपये

Sat, 16 May 2020 06:03 PM IST
मुकेश कुमार नीलेश शर्मा, अमर उजाला, मैनपुरी
नीलेश शर्मा, अमर उजाला, मैनपुरी Published by: मुकेश कुमार Updated Sat, 16 May 2020 06:03 PM IST
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coronavirus lockdown: migrant labourers returned in mainpuri
घर जाते प्रवासी मजदूर - फोटो : अमर उजाला
जिन आंखों ने कुछ कर गुजरने के सपने देखे थे, आज वो आंसुओं से नम हैं। उम्मीदों की इमारत आज ढहने लगी हैं। कोरोना महामारी ने रोजगार के साथ ही दो वक्त का निवाला भी छीन लिया है। यह कहानी मैनपुरी जिले के उन हजारों मजदूरों की है जो दो जून की रोजी रोटी के लिए घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर मेहनत मजदूरी करने गए थे। सूरज भी इनमें से एक है। दूसरे शहर में मेहनत मजदूरी करते हुए दो साल बिता दिए, घर लौटा तो जमा पूंजी के रूप में 490 रुपये लेकर।
coronavirus lockdown: migrant labourers returned in mainpuri
चेन्नई से मैनपुरी लौटा सूरज - फोटो : अमर उजाला
भोगांव कस्बा के गांधीनगर मोहल्ला निवासी प्रेमनारायण गुप्ता का बेटा सूरज गुप्ता चेन्नई से वापस लौट आया है। घर में ऐसा उत्साह है, जैसे बेटा किसी जंग को जीतकर लौटा हो। परिजन कोरोना काल में बेटे के सही सलामत लौटने पर ईश्वर को धन्यवाद दे रहे हैं। इसी उत्साह और उमंग के बीच सूरज की आंखें नम हैं। उसके सामने रोजगार का साधन नहीं है। 
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पैदल घर जा रहे प्रवासी मजदूर - फोटो : अमर उजाला
सूरज ने बताया कि दो साल पहले चेन्नई की एक ग्लास फैक्टरी में काम करने गया था। वेतन की शुरुआत आठ हजार रुपये से हुई। साल गुजरी तो पगार बढ़कर नौ हजार हो गई। उम्मीद थी कि कुछ साल रहकर वेतन और बढ़ जाएगा। कोरोना महामारी ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया। दूसरे शहर में जो कमाया, वहीं खर्च हो गया। कुछ रुपये जुटाए तो घर भेज दिए। दो साल की नौकरी के बाद सूरज जमा पूंजी 490 रुपये लेकर घर लौटा है। कोरोना ने कामगारों के हौसले को तोड़ दिया है। सूरज ने भी घर छोड़कर दूसरे शहर जाने से इनकार कर दिया है। उसने लकड़ी का ठेला तैयार कर लिया है। उसका कहना है कि अब यहीं रहकर कामधंधा करेगा। कुछ नहीं हुआ तो सब्जी ही बेच लेगा, लेकिन चेन्नई लौटकर नहीं जाएगा। 
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फरीदाबाद से मैनपुरी लौटा सतेंद्र - फोटो : अमर उजाला
जीटी रोड भोगांव निवासी प्रेमबाबू का पुत्र सतेंद्र भी लॉकडाउन में कई तरह की परेशानी का सामना करता हुआ घर पहुंच गया है। 11 साल की नौकरी में सतेंद्र के पास जमा पूंजी के रूप में सिर्फ तीन हजार रुपये हैं। सतेंद्र 2009 में फरीदाबाद की पाइप बनाने वाली फैक्टरी से 55 सौ रुपये में नौकरी की शुरुआत की थी। नागलोई की गुटखा फैक्टरी में काम किया, तो वेतन दस हजार मिला। 
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coronavirus lockdown: migrant labourers returned in mainpuri
घर जाने के लिए जान तक जोखिम में डाल रहे मजदूर - फोटो : अमर उजाला
सतेंद्र दो साल से पानीपत की एक ब्रुश फैक्टरी में 11 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन पर काम कर रहा था। लॉकडाउन में फैक्टरी बंद हुई तो घर के लिए चल दिया। पानीपत से दिल्ली पैदल, फिर दिल्ली से अलीगढ़ तक ट्रक मिला। इसके बाद फिर कई किलोमीटर पैदल चला। फिलहाल वो घर पर है। सतेंद्र का कहना है नौकरी नहीं करूंगा तो परिवार को क्या खिलाऊंगा। जमा पूंजी भले ही तीन हजार है, लेकिन महीने के खर्च तो इसी नौकरी से चलते थे। जब कोरोना का अंत होगा तो फिर कामधंधे पर लौटूंगा।
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