चंद्र वरदाई ने परमाल रासो में लिखा है ‘अल गारन नृप आइयव, जहां बटेश्वर देश ब्रह्मलाल अस्नान करि, करी सप्त दिन सेव’। ये पंक्तियां बटेश्वर में आल्हा ऊदल की वीरगाथा की गवाह हैं। सावन के महीने में यहां के गांवों में आल्ह खंड गूंजता है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। कोरोना ने 800 साल में पहली बार इसकी चौपाल जमने नहीं दी है।
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पृथ्वीराज चौहान ने बटेश्वर के हनुमान गढी टीले पर जमाया था डेरा
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इतिहासकार डॉ. शिव शंकर कटारे कहते हैं कि परमाल रासो की बटेश्वर की विरासत से जुड़ी रचनाएं ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि करती हैं। आल्हा ऊदल की वीरगाथा और आल्ह खंड से जुड़े साक्ष्य बटेश्वर में आज भी मौजूद हैं।
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बटेश्वर की मंदिर श्रृंखला
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सिरसागढ़ में मलिखान पर चढ़ाई के लिए दिल्ली से निकले पृथ्वीराज चौहान ने बटेश्वर के हनुमान गढ़ी टीले पर डेरा डाला था। 800 साल हो गए, सावन के महीने में भदावर क्षेत्र के गांवों में आल्ह खंड की महफिल सजती थी। महामारी कोरोना के कारण इस साल ऐसा नहीं हुआ।
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पृथ्वीराज चौहान ने बटेश्वर के हनुमान गढ़ी टीले पर जमाया था डेरा
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पूर्व जिला पंचायत सदस्य मलखान सिंह राठौर, क्वारी के राजवीर सिंह, पार्वतीपुरा के अजमेर सिंह, बटेश्वर के जयेंद्र वर्मा, जरार के जोधाराम ने बताया कि ऐसा पहली बार हुआ है कि सावन में आल्ह खंड की चौपालें न जमी हों।
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शौरीपुर बटेश्वर का जैन मंदिर
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भगवान अजितनाथ हैं आल्हा ऊदल के इष्टदेव
बटेश्वर के प्राचीन जैन मंदिर में भगवान अजितनाथ विराजमान है। भगवान अजितनाथ की पहचान आल्हा ऊदल के इष्टदेव (मनियादेव) के रूप में भी है। बटेश्वर में परमर्दिदेव ने सफेद संगमरमर का मंदिर बनवाया था।