आगरा के बाह तहसील के गांवों में दिवाली पर तेजी से घूमते चाकों पर कुम्भकार दीयों को आकार दे रहे हैं। कोरोना काल में बढ़ी दुश्वारियों से आर्थिक संकट के हालात में बेबसी की जिंदगी जीने को मजबूर कुम्भकारों को करवाचौथ पर राहत मिली थी। उन्हें अब दिवाली पर अच्छी बिक्री से अपने घर पर खुशियों के दीये जलने की उम्मीद है।
गांव बिजकौली के नरेश भी दिन-रात दीय बनाने का काम कर रहे हैं। उनकी आंखों की रोशनी चली गई है, सुनाई भी नहीं देता। इसके बाद भी वह दिवाली पर लोगों के घरों को रोशन करने के लिए चाक पर दीपक बना रहे हैं।
नरेश ने बताया कि वह बचपन से ही दीये बनाने का काम कर रहे हैं। शुरू से ही सुनाई नहीं देता है। करीब 11 साल पहले वह बीमार हुए थे। उचित इलाज न मिलने के कारण उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। इसके बाद भी उन्होंने काम करना बंद नहीं किया।
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मिट्टी के दीये
- फोटो : अमर उजाला
नरेश पर दो परिवारों के पालन पोषण की जिम्मेदारी है। उनका एक आठ वर्षीय बेटा सुमित है। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। कोरोना के कारण पिछले दो साल में काफी नुकसान हुआ है, लेकिन इस बार कारोबार की उम्मीद है।
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दीया बनाते नरेश
- फोटो : अमर उजाला
उन्होंने बताया कि उनका भाई हाकिम सिंह दिव्यांग हैं। भाभी सीमा काम में उनकी मदद करती हैं। उनके पास खेती की जमीन नहीं है। भाई के तीन बच्चे हैं। मिट्टी के काम के भरोसे ही दोनों परिवार हैं। सरकार से न तो अभी तक आवास मिला और न ही दोनों भाइयों को पेंशन।
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दीया बनाता कुंभकार
- फोटो : अमर उजाला
बिजकौली गांव के रामनेरश और उनके भाई रूप सिंह ने बताया कि इस बार दिवाली मिट्टी के दीयों की मांग ज्यादा है। इसलिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं।
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मिट्टी के दीये
- फोटो : अमर उजाला
यहीं के भीकम सिंह और हाकिम सिंह ने बताया कि लॉकडाउन में जिंदगी पटरी से उतर गई थी। इस साल करवाचौथ पर अच्छी बिक्री से दिवाली पर कमाई होने की उम्मीद है।