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अपराजिता: 'पिता का अपहरण हुआ, मां की याददाश्त गई, हालात को हराकर बनीं बैंक अधिकारी'
Sun, 16 Aug 2020 09:07 AM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sun, 16 Aug 2020 09:07 AM IST
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अपराजिता-100 मिलियन स्माइल्स
- फोटो : अमर उजाला
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आज हम आपको रूबरू कराएंगे उन महिला बैंककर्मियों के संघर्ष से, जिन्होंने मुश्किल हालात का सामना कर अपना मुकाम हासिल किया। नौकरी मिलने के बाद भी इनकी चुनौतियां कम नहीं हुई। ये कहती हैं कि हौसले के दम पर ही मुसीबतों का सामना किया जा सकता है, इन्होंने यह करके दिखाया है।
मोनिका आजाद
- फोटो : अमर उजाला
पिता की तलाश में भटकते, छूट गई थी पढ़ाई - मोनिका आजाद
मारुति एस्टेट में रहने वाली केनरा बैंक में शाखा प्रबंधक हैं। वो बताती हैं कि जब मैं 10 वर्ष की ही थी, जब 1998 में पिता का अपहरण हो गया। तब हम गोरखपुर में रहते थे। सदमे से मां की याददाश्त चली गई। हम भाई-बहनों और मां को मामा ने आगरा बुला लिया। मेरी एक साल की पढ़ाई छूट गई। पिता की तलाश में थाना और कचहरी के चक्कर लगाए। इन मुसीबतों के बीच मैंने बीटेक किया। परिवार को सहारा देने के लिए मैंने बैंक की नौकरी की। पहले लिपिक थी, अब केनरा बैंक में शाखा प्रबंधक हूं।
मारुति एस्टेट में रहने वाली केनरा बैंक में शाखा प्रबंधक हैं। वो बताती हैं कि जब मैं 10 वर्ष की ही थी, जब 1998 में पिता का अपहरण हो गया। तब हम गोरखपुर में रहते थे। सदमे से मां की याददाश्त चली गई। हम भाई-बहनों और मां को मामा ने आगरा बुला लिया। मेरी एक साल की पढ़ाई छूट गई। पिता की तलाश में थाना और कचहरी के चक्कर लगाए। इन मुसीबतों के बीच मैंने बीटेक किया। परिवार को सहारा देने के लिए मैंने बैंक की नौकरी की। पहले लिपिक थी, अब केनरा बैंक में शाखा प्रबंधक हूं।
प्रिया जैन
- फोटो : अमर उजाला
पिता के साथ से हुईं मुश्किलें आसान- प्रिया जैन
प्रिया जैन एचडीएफसी बैंक में डिप्टी मैनेजर हैं। उन्होंने बताया कि कॉलेज खत्म करने के बाद नौकरी करना चाहती थी। लेकिन परिवार में ही लोगों ने इसका विरोध किया। सुरक्षा का हवाला देकर रास्ता रोका, रिश्तेदार ही ताने देते थे। बोलते थे कि लड़कियों का बाहर निकलकर काम करना ठीक नहीं है। समाज क्या कहेगा। लेकिन पिता ने साथ दिया। हिम्मत बनाए रखी। साक्षात्कार दिए, लेकिन नौकरी नहीं मिली। निराशा हुई लेकिन प्रयास करती रही। एचडीएफसी बैंक में जॉब मिली। आज तीन साल बाद मैं डिप्टी मैनेजर के पद पर कार्यरत हूँ।
प्रिया जैन एचडीएफसी बैंक में डिप्टी मैनेजर हैं। उन्होंने बताया कि कॉलेज खत्म करने के बाद नौकरी करना चाहती थी। लेकिन परिवार में ही लोगों ने इसका विरोध किया। सुरक्षा का हवाला देकर रास्ता रोका, रिश्तेदार ही ताने देते थे। बोलते थे कि लड़कियों का बाहर निकलकर काम करना ठीक नहीं है। समाज क्या कहेगा। लेकिन पिता ने साथ दिया। हिम्मत बनाए रखी। साक्षात्कार दिए, लेकिन नौकरी नहीं मिली। निराशा हुई लेकिन प्रयास करती रही। एचडीएफसी बैंक में जॉब मिली। आज तीन साल बाद मैं डिप्टी मैनेजर के पद पर कार्यरत हूँ।
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सपना बजाज
- फोटो : अमर उजाला
खानदान में मैं पहली हूं सरकारी नौकरी वाली - सपना बजाज
अपर्णा पंचशील निवासी सपना बजाज ने कहा कि मेरे परिवार में दूर-दूर तक सरकारी नौकरी में कोई नहीं था। मेरा सपना बैंक ऑफिसर बनने का था। किसी ने गाइड नहीं किया। परिचितों से जानकारी की तो जवाब मिला, तुमसे नहीं हो पाएगा, बहुत कठिन परीक्षा होती है। मैने हिम्मत नहीं हारी। खुद ही तैयारी शुरु की। आखिर मेहनत रंग लाई। 2014 में पंजाब नेशनल बैंक में ऑफिसर बनी। इसी साल पिता का देहांत हो गया। ऐसे में मैंने परिवार को संभाला और खुद को भी।
अपर्णा पंचशील निवासी सपना बजाज ने कहा कि मेरे परिवार में दूर-दूर तक सरकारी नौकरी में कोई नहीं था। मेरा सपना बैंक ऑफिसर बनने का था। किसी ने गाइड नहीं किया। परिचितों से जानकारी की तो जवाब मिला, तुमसे नहीं हो पाएगा, बहुत कठिन परीक्षा होती है। मैने हिम्मत नहीं हारी। खुद ही तैयारी शुरु की। आखिर मेहनत रंग लाई। 2014 में पंजाब नेशनल बैंक में ऑफिसर बनी। इसी साल पिता का देहांत हो गया। ऐसे में मैंने परिवार को संभाला और खुद को भी।
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इरा सक्सेना
- फोटो : अमर उजाला
नौकरी लगने के बाद संघर्ष हुआ शुरू- इरा सक्सेना
कमला नगर की रहने वाली इरा सक्सेना मध्यम वर्ग परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उन्होंन कहा कि परिवार का साथ था, इसलिए वर्ष 2011 में कैनरा बैंक में नौकरी तो मिल गई, लेकिन संघर्ष की शुरुआत हो गई। परिवार भी संभालना था और नौकरी भी। बैंक में देर रात तक काम करती, घर में बच्चा बीमार होता तो चिंता में डूबी रहती। इस कारण प्रमोशन भी मुश्किल हो गया। तनाव में रहने लगी लेकिन धीरे-धीरे खुद को संभाला। महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही आती है कि वह जॉब करें या परिवार को देखें।
कमला नगर की रहने वाली इरा सक्सेना मध्यम वर्ग परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उन्होंन कहा कि परिवार का साथ था, इसलिए वर्ष 2011 में कैनरा बैंक में नौकरी तो मिल गई, लेकिन संघर्ष की शुरुआत हो गई। परिवार भी संभालना था और नौकरी भी। बैंक में देर रात तक काम करती, घर में बच्चा बीमार होता तो चिंता में डूबी रहती। इस कारण प्रमोशन भी मुश्किल हो गया। तनाव में रहने लगी लेकिन धीरे-धीरे खुद को संभाला। महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही आती है कि वह जॉब करें या परिवार को देखें।