Panchopachara Puja: जब हम अपने शास्त्रों की सलाह के अनुसार पूजा विधि करते हैं तब हमें अपने सर्वज्ञ ऋषियों के संकल्प-शक्ति (संकल्प की ऊर्जा) का लाभ मिलता है। शास्त्रों में वर्णित पूजा करते समय परम भक्ति और भाव समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यदि पूजा विधि करते समय भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति की कमी होती है, तो वह उन तक नहीं पहुंचता है; क्योंकि, भगवान भव के लिए तरसते हैं। शास्त्रों में वर्णित विज्ञान के अनुसार और देवता के प्रति आस्था से भरे अंतःकरण के साथ किए गए उपदेशों को एक देवता की पूजा कहा जाता है। तभी यह देवता की अपेक्षाओं के अनुसार होता है, और इसे सही मायने में 'पूजा' कहा जा सकता है हिंदू धर्म के अनुसार सगुण (भौतिक) उपासना का आधार देवताओं की पूजा विधि (अनुष्ठानात्मक पूजा) है। यदि हम भगवान की पूजा उचित तरीके से करते हैं तो भगवान हम पर प्रसन्न होंगे और हम पर अपनी कृपा बरसाएंगे। इसलिए, धर्मग्रंथों ने हमें धार्मिकता का पालन करना सिखाया है और भाव (आध्यात्मिक भावना) समृद्ध तरीके से हम षोडशोपचार या पंचोपचार पूजा करनी चाहिए। पंचोपचार, अर्थात्, गंध लगाना, फूल चढ़ाना, धूप (लोबान), आरती और नैवेद्य अर्पित करना का निर्माण करता है।
Panchopachara Puja: जानिए क्या है पंचोपचार पूजा पद्धति, जानिए क्या है इसका महत्व
क्या है पंचोपचार पद्धति
आपने पूजा की पंचोपचार पद्धति के बारे में सुना होगा। सर्वप्रथम इसमें पांच देवताओं का पूजन किया जाता है। श्री गणेश जी, शंकर भगवान , दुर्गा माता (भवानी, पार्वती) विष्णु भगवान एवं सूर्यदेव। इस पद्धति में किसी भी देवी-देवता का पूजन पांच प्रकार से किया जाता है।
गन्धं पुष्पं तथा धूपं दीपं नैवेद्यमेव च ।
अखंडफलमासाद्य कैवल्यं लभते धु्रवम् ।।
अर्थात् देव पूजन में गंध, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य इन पांच चीजों का प्रयोग किया जाता है।
पंचोपचार पद्धति की मुद्राएं
शास्त्रों में पंचोपचार पद्धति की पांच मुद्राएं हैं। इन मुद्राओं के माध्यम से देवी-देवता उस पूजन सामग्री को ग्रहण करते हैं। इन सामग्रियों को अर्पित करने के लिए इनके नाम के अनुसार ही गंध मुद्रा, पुष्प मुद्रा, धूप मुद्रा, दीप मुद्रा तथा नैवेद्य मुद्रा कहा जाता है।
गंध मुद्रा
मुद्राएं बनाने के लिए दोनों हाथों की अंगुलियों और अंगूठे का प्रयोग किया जाता है। अंगूठा तथा कनिष्ठिका अंगुली को एक साथ मिला देने से गंध मुद्रा बनती है। इसके अनुसार सबसे पहले अपने आराध्य को अनामिका से (कनिष्ठिका के समीप की उंगली से) चंदन लगाएं। फिर दाएं हाथ के अंगूठे और अनामिका के बीच चुटकीभर कर पहले हलदी, फिर कुमकुम देवता के चरणों में अर्पित करें ।
पुष्प मुद्रा
अंगूठे की जड़ में तर्जनी को लगाने पर पुष्प मुद्रा बनती है। इसके अनुसार देवता को उनके प्रिय पुष्प चढ़ाएं। जैसे- शिवजी को बिल्वपत्र तथा श्री गणेशजी को दूर्वा और लाल पुष्प। पुष्प देवता के सिर पर न चढ़ाकर उनके चरणों में अर्पित करें । डंठल देवता की ओर एवं पंखुड़ियां (पुष्पदल) अपनी ओर कर पुष्प अर्पित करें ।