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खतरे में पहाड़, नहीं सुधरे तो कुदरत बरपाएगी कहर, आईआईटी के वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

Wed, 21 Nov 2018 12:55 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला Updated Wed, 21 Nov 2018 12:55 PM IST
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Mountains in danger in Himachal pradesh due to excessive tree felling and Unscientific Construction

अंधाधुंध पेड़ कटान, सड़कों, सुरंगों और भवनों के अवैज्ञानिक तरीके से निर्माण के कारण हिमाचल के पहाड़ खतरे में हैं। इससे हिमालय की उच्च और मध्यवर्ती पहाड़ों की मुख्य संरचना तेजी से बदल रही है। पहाड़ों की मजबूती की मुख्य सतह यानी मेन सेंट्रल क्रस्ट (एमसीटी) और  मेन बाउंड्री क्रस्ट (एमबीटी) कमजोर पड़ने लगी है। इससे मध्यवर्ती क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदा जैसे बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं होने से जानमाल का भारी नुकसान हो रहा है।

Mountains in danger in Himachal pradesh due to excessive tree felling and Unscientific Construction

आईआईटी मंडी में प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के ‘भूस्खलन की रोकथाम एवं पुनर्वास’ पर आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने इस पर चिंता जताई है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि पहाड़ों से छेड़छाड़ नहीं रुकी तो हिमाचल में भूस्खलन की घटनाएं रोकना मुमकिन नहीं होगा। प्रशिक्षण कार्यक्रम कोटरोपी में भूस्खलन 2017 पर केंद्रित था। इसमें 50 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। प्रतिभागियों से पिछले साल की बड़ी आपदाओं को ध्यान में रखते हुए भूस्खलन की रोकथाम एवं पुनर्वास के उपाय विकसित करने को कहा गया। इस अध्ययन से संबंधित सामग्री जल्द प्रदेश सरकार को सौंपी जाएगी।

Mountains in danger in Himachal pradesh due to excessive tree felling and Unscientific Construction

लाखों साल पहले जब भारत बना तो वह यूरोप और एशिया से अलग था। धीरे-धीरे जब भारत एशिया से टकराने लगा तो उसके हिमालय की संरचना हुई। पहाड़ एक-दूसरे से टकराते गए और सतह आपस में जुड़ती गई। जो सतह ऊपर की हुई उसे एमबीटी कहा गया। जिसमें काफी कम बदलाव होते हैं, लेकिन एमसीटी में बदलाव जारी है और वहां प्राकृतिक आपदा का ज्यादा खतरा है।

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Mountains in danger in Himachal pradesh due to excessive tree felling and Unscientific Construction

आईटीआई मंडी के स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफेसर डीपी शुक्ला और डॉ. केवी उदय ने बताया कि  मध्यवर्ती क्षेत्र जैसे मंडी, कांगड़ा, कुल्लू और चंबा के क्षेत्रों में प्राकृतिक बदलाव के साथ-साथ पहाड़ों से छेड़छाड़ पर भी खतरा है। कोटरोपी पहाड़ी निचले क्षेत्रों में है और क्रस्ट के बदलाव के कारण ही यहां तबाही हुई। इसके विपरीत किन्नौर, लाहौल-स्पीति और ऊपरी शिमला के क्षेत्रों में पहाड़ों की संरचना की सतह को प्राकृतिक बदलाव से कम खतरा है। यहां पहाड़ों से छेड़छाड़ से ही प्राकृतिक आपदाओं का खतरा रहता है।

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वैज्ञानिकों ने हाल ही में मनाली, चंबा, मंडी और कांगड़ा में बादल फटने का कारण आरोग्रेफिक रिसीपिटेशन को बताया। इसमें एमबीटी और एमसीटी में हो रहे बदलाव के कारण बादलों का ऊपर न उठ पाना जिम्मेदार है। वैज्ञानिकों ने भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में चेतावनी सेंसर लगाने की अहमियत पर बल दिया। शुरू में चेतावनी देने और कम कीमत के सेंसर विकसित करने और भूस्खलन के कारण, पानी की उचित निकासी, इसके परिणाम एवं अनुकूलन पर ध्यान देते हुए बहुविषयी प्रयास करने पर जोर दिया गया।

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