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शिमला: 27 साल बाद पदोन्नति की मांग पर हाईकोर्ट सख्त, एसबीआई अफसर की याचिका खारिज
Tue, 08 Sep 2026 05:30 AM IST
Krishan Singh
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
Published by: Krishan Singh
Updated Tue, 08 Sep 2026 05:30 AM IST
सार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवाओं में देरी और लापरवाही के आधार पर दशकों पुराने पदोन्नति के दावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एक सेवानिवृत्त अधिकारी की याचिका को खारिज करते यह फैसला दिया है।
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हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवाओं में देरी और लापरवाही के आधार पर दशकों पुराने पदोन्नति के दावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एक सेवानिवृत्त अधिकारी की याचिका को खारिज करते यह फैसला दिया है। याचिकाकर्ता संतोष कुमार कौशल ने 1990 से 1998 के दौरान जूनियर मैनेजमेंट ग्रेड स्केल-I से उच्च पद पर पदोन्नति न मिलने और उससे जुड़े वित्तीय लाभों की मांग को लेकर 2017 में (अपनी सेवानिवृत्ति के समय) याचिका दायर की थी।
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कोर्ट ने माना कि इतने वर्षों बाद पदोन्नति देने से उन अधिकारियों के हित प्रभावित होंगे, जो पहले ही पदोन्नत हो चुके हैं। बैंक की ओर से 2001 में ही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के समक्ष स्पष्ट किया जा चुका था कि याचिकाकर्ता कट-ऑफ अंक प्राप्त करने में विफल रहे थे और कई परीक्षाओं में अनुपस्थित रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने इस निर्णय को समय रहते चुनौती नहीं दी। हाईकोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि केवल आवेदन या आरटीआई याचिका दाखिल करने से देरी को जायज नहीं ठहराया जा सकता।
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लंबे समय तक अपने अधिकारों के प्रति निष्क्रिय रहने वाले कर्मचारियों को कानून फेंस-सिटर मानता है, जो बाद में किसी राहत के हकदार नहीं होते। खंडपीठ ने माना कि एकल पीठ की ओर से याचिका खारिज करने का फैसला पूरी तरह तर्कसंगत और कानून सम्मत था। जब याचिकाकर्ता ने 1990 से रोकी गई पदोन्नति के लिए 2017 में याचिका दायर की, तो एकल पीठ की ओर से देरी और लापरवाही के आधार पर याचिका को खारिज करने का निर्णय पूरी तरह से न्यायसंगत था। इसी के साथ हाईकोर्ट ने एलपीए को बिना किसी राहत के खारिज कर दिया।
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