हिमाचल प्रदेश की देवभूमि चंबा में आज भी कई मान्यताएं प्रचलित हैं। जिला चंबा के जनजातीय क्षेत्र पांगी की बात की जाए तो यहां आज भी मशाल जलाकर पूर्वजों को याद करने की मान्यता है। वर्तमान समय में साच, मिंधल रेई, घिसल, पूर्थी, शौर, कुलाल, शुण, अजोग में खाउल त्योहार मनाया जा रहा है। खाउल त्योहार को पांगीवासी बड़े धूमधाम से मना रहे हैं। पांगीवासियों में मान्यता है कि मशाल जलाकर लोग अपने पूर्वजों को भी याद करते हैं। वहीं हर क्षेत्र के गांव में अपनी कुलदेवी की पूजा-अर्चना करते है। पांगी घाटी में सबसे आखिरी गांव सुराल से यह त्योहार शुरू किया जाता है, जो जम्मू के बॉर्डर के साथ लगता गांव है।
यहां मशाल जलाकर करते हैं पूर्वजों को याद, देखें तस्वीरें
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खाउल त्योहार से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि पांगी घाटी में सर्दियों के दिनों राक्षस राज होता है, जिन्हें अपने क्षेत्र से भगाने के लिए लोग सर्वप्रथम इस त्योहार को मनाते हैं। इस त्योहार के दिन पांगी घाटी के लोग विशेष पूजा-अर्चना के बाद अपने घरों से मशाल निकालते हैं और उस मशाल के माध्यम से राक्षसों को भागाते हैं। पांगी घाटी के हर पंचायत में दो माह तक इस उत्सव को मनाया जाता है।
जैसे शनिवार को इस उत्सव का आगाज लूज, धरवास, चलोली, पूंटो, कवास, सुराल व चलोली व अन्य गांव में हुआ है। पहले दिन घर का प्रमुख पंगवाली वेशभूषा में तैयार होकर पूजा करता है। जैसे ही शाम ढल जाती है, तो ग्रामीण मशाल बनाने की तैयारी में जुट जाते हैं। देर रात चांद निकलते ही लोग मशाल जलाकर घर से बाहर निकलते हैं और अपने गांव के कुलदेवी के मंदिर की ओर रुख करते हैं।
इस दौरान सभी लोग एक कतार में चलते हैं। त्योहार के दूसरे दिन पूरा प्रजामंडल एकत्रित होकर खाउल उत्सव का जश्न मनाते है। पांगी कल्याण संघ के प्रधान भगत बड़ोतरा, बुधिया राम भारद्वाज, बजीर चंद ने बताया कि खाउल उत्सव बुजुर्गों की याद में मनाया जाता है। पांगी घाटी दो हिस्सों में बंटी हुई है जिसे पांगी घाटी की भाषा में ऊपर चाड़ी और नीचे चाड़ी कहा जाता है। इस त्योहार को दो माह तक मनाया जाता है।
बनते हैं कई तरह के व्यंजन
खाउल त्योहार के दौरान पांगी वासी पारंपरिक वेशभूषा में तैयार होकर विभिन्न प्रकार के व्यंजन मंडे (डोसा), हलवा, पूरी, कड्डी, चावल, दाल बनाते हैं।