फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें

अंतरराष्ट्रीय लवी मेला: 300 साल का इतिहास समेटे हुए है यह मेला, तिब्बत-अफगानिस्तान से आत थे व्यापारी

Mon, 14 Nov 2022 05:26 PM IST
अरविन्द ठाकुर संवाद न्यूज एजेंसी, रामपुर बुशहर
संवाद न्यूज एजेंसी, रामपुर बुशहर Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Mon, 14 Nov 2022 05:26 PM IST
विज्ञापन
300 year old history of international lavi fair rampur bushahr himachal pradesh
अंतराष्ट्रीय लवी मेला। - फोटो : संवाद

हिमाचल प्रदेश मेलों एवं त्योहारों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। हर त्योहार और मेले का अपना एक खास महत्व है। कुछ मेले और त्योहार देश ही नहीं पूरे विश्व में अपनी एक खास पहचान कायम किए हुए हैं। 17वीं शताब्दी से शुरू हुआ लवी मेला आज भी अंतरराष्ट्रीय लवी मेले के नाम से पूरे विश्व में जाना जाता है। इस व्यापारिक मेले का प्रदेश की आर्थिक प्रगति में अहम योगदान है। पुराने समय में यहां के ऊन, पश्मीना, चिलगोजा और  स्थानीय उत्पाद की भारत ही नहीं विदेशों में भी बड़ी मांग थी। उस दौर में बुशहर के तिब्बत के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध थे। यह व्यापार इतना अधिक बढ़ा कि तिब्बत से आयातित माल की ब्रिकी के लिए लवी मेले का प्रचलन करना पड़ा। 

loader
300 year old history of international lavi fair rampur bushahr himachal pradesh
- फोटो : संवाद
बताया जाता है कि बुशहर के राजा केहर सिंह और तिब्बती सेनापति की संधि हुई और दोनों तरफ के व्यापारियों को छूट दी गई। लवी शब्द का अर्थ लोई है। लोई जो भेड़ों की ऊन से बनती है। 1911 में तत्कालीन राजा केहर सिंह के समय शुरू हुए लोई मेले में तिब्बत, अफगानिस्तान के व्यापारी यहां कारोबार करने आते थे। यहां के व्यापारी ड्राई फ्रूट, ऊन, पशमीना और पशुओं सहित घोड़े लेकर रामपुर पहुंचते थे। इसके बदले में रामपुर से नमक, गुड़ सहित अन्य राशन लेकर जाते थे। नमक मंडी जिला के गुम्मा से यहां लाया जाता था। 
विज्ञापन
विज्ञापन
300 year old history of international lavi fair rampur bushahr himachal pradesh
- फोटो : संवाद
शिमला, कुल्लू, किन्नौर और मंडी जिले से लोग गुड़, नमक और मसाले सहित अन्य जरूरत का सामान खरीदने के लिए पैदल चलकर पहुंचते थे। लवी मेले में किन्नौर के लोग नमक खरीदना नहीं भूलते थे। स्थानीय लोग बताते हैं कि 1983 में वीरभद्र सिंह के पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद 1985 में लवी को अंतरराष्ट्रीय मेला घोषित किया गया। लेकिन अब यह मेला किन्नौर के व्यापारियों के अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और उतर प्रदेश के कारोबारियों तक सामित रह गया है। 
300 year old history of international lavi fair rampur bushahr himachal pradesh
- फोटो : संवाद
पुराने समय में लवी मेले के दौरान आपस में काफी मेलजोल रहता था। किनौर के विभिन्न गावों से लोग पूरे परिवार सहित पदम छात्र स्कूल में रहते थे और वहां नाच गाने का दौर चलता था। सभी लोग एक साथ ढोल नगाड़ों पर सारी रात नाच गाना करते थे। लेकिन आज मेले में यह सब देखने को नहीं मिल रहा है। उस समय किन्नौर, लाहौल स्पीति और अन्य क्षेत्रों से व्यापारी पैदल चल कर रामपुर पहुंचते थे। इसमें ऊन, पशमीना, भेड़-बकरियों और घोड़ों का व्यापार मुख्य रूप से होता था। कपड़ों में जिला किन्नौर के सुनम गांव का गुदमा भेड़ की ऊन से बने कंबल का व्यापार काफी मात्रा में होता था।
विज्ञापन
300 year old history of international lavi fair rampur bushahr himachal pradesh
- फोटो : संवाद
इस बार 11 से 14 नवंबर तक लवी मेला आयोजित हुआ। मेले में आज भी रामपुर, आनी, लाहौल-स्पीति, किन्नौर, शिमला जिले सहित बाहरी राज्यों के हजारों लोग खरीदारी करते हैं। अधिकारिक तौर पर मेला सिर्फ चार दिन का होता है लेकिन खरीदारी का सिलसिला करीब एक पखवाड़े से अधिक सयम तक चलेगा।
विज्ञापन
अगली फोटो गैलरी देखें

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन

Followed