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जब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बिस्मिल्ला खां को भेजा था न्योता, देश के आजाद होने पर बजाई थी यह धुन 

Tue, 21 Aug 2018 02:48 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Updated Tue, 21 Aug 2018 02:48 PM IST
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Pandit jawaharlal nehru sent invitation to bismillah Khan after independence of country
ustad bismillah khan
भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खां की आज बारहवीं पुण्यतिथि है। संगीत की बात चले तो इस शहनाई के बिना वह पूरी नहीं होती। यह अलग बात है कि आज वह अद्भुत फनकार हमारे बीच नहीं है पर शहनाई पर उनके साज आज भी लोगों के दिलो में जिंदा है। आगे की स्लाइड्स में देखें...


 
Pandit jawaharlal nehru sent invitation to bismillah Khan after independence of country
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को भारत रत्न
बिस्मिल्ला खां का जन्म बिहार प्रदेश के डुमरांव के ठठेरी बाजार में 21 मार्च 1916 को हुआ था। आठ वर्ष की उम्र में वो वाराणसी आ गए और यहां के हो गए। बनारस के हड़हा सराय निवासी भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई में मर्म समझने की कुछ खास बात जरूर थी। 

 
Pandit jawaharlal nehru sent invitation to bismillah Khan after independence of country
बिस्मिल्लाह खां
सात समंदर पार तक इस अमर फनकार की बुलंदियां आज भी कायम हैं। शहनाई ने उन्हें नहीं बल्कि उन्होंने शहनाई को नई पहचान दी। 21 अगस्त 2006...। इस महान फनकार ने आज के दिन ही इस दुनिया से रुखसत ली थी। शहनाई से उनके इश्क की दास्तां देखिए कि काशी की सांस्कृतिक विरासत के इस पुरोधा की कब्र में शहनाई भी दफनाई गई।

 
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Pandit jawaharlal nehru sent invitation to bismillah Khan after independence of country
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भी थे उस्ताद के मुरीद।
उस्ताद ने शहनाई जैसे साधारण वाद्य यंत्र को तालाब की तलहटी से उठाकर संगीत के शिखर पर पहुंचा दिया। वह शहनाई बजाने को इबादत मानते थे। काशी के घाटों पर और मंदिरों के सामने शहनाई बजाते, लोग सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते।

 
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Pandit jawaharlal nehru sent invitation to bismillah Khan after independence of country
BISMILLAH KHAN - फोटो : SELF
गंगा जमुनी तहजीब के अमल बरदार, काशी की अनमोल धरोहर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई के शहंशाह ऐसे ही नहीं थे। संकट मोचन मंदिर से लेकर मोहर्रम के जुलूस में शहनाई के जरिये उन्होंने ताउम्र कौमी एकता की मिसाल पेश की। मुहर्रम पर वो अपनी खास चांदी की शहनाई बजाते थे तो बनारस के हर मंदिर में उन्होंने अपनी शहनाई के सुरों से देवी-देवताओं की आराधना की। 

 
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