हम और आप लॉकडाउन का पालन करें, इसलिए उन्होंने अपनी ममता को ‘लॉकडाउन’ कर दिया है। हम और आप सामाजिक दूरी की लक्ष्मण रेखा को पार न करें, इसलिए उन्होंने अपने घर में खुद के लिए एक लकीर खींच दी है। ये हकीकत है खाकी वर्दी वाली कोरोना फाइटर्स की। ये दूर से ही अपने जिगर के टुकड़ों को देखकर संतोष कर लेती हैं, जबकि इनके बच्चों को लगता है कि मम्मी बदल गई हैं। उनकी इस कठिन ड्यूटी को आइए हम भी थोड़ा आसान बनाएं, इन्हें सलाम करें। इनका साथ देने के लिए सिर्फ लॉकडाउन और सामाजिक दूरी के नियमों का ईमानदारी से पालन कर लें।
कोरोना फाइटर्स को सलामः उसे लगता है, मम्मी बदल गई हैं, अब मुझे प्यार नहीं करतीं
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बेटा जानता ही नहीं मम्मी घर में है, छिप कर रहती हूं उससे
एसीपी श्वेता श्रीवास्तव का 5 साल का बेटा है। उनके कंधों पर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। ड्यूटी से लौटने के बाद किस तरह से घर के लोगों के साथ सामाजिक दूरी के नियम का पालन कर पाती हैं? इस सवाल के जवाब में कहती हैं कि मैं 15 दिन से अपने बेटे से नहीं मिली हूं। मेरे माता-पिता, पति और बेटा उसी घर में हैं, लेकिन ड्यूटी से आकर मैं सीधे ऊपर कमरे में चली जाती हूं, ताकि बेटा देख न ले। उसे नहीं मालूम की मैं घर में हूं। उसके साथ-साथ अन्य सदस्यों की भी चिंता है, इसलिए ये दूरी बनाए रखना जरूरी है। हां, इंतजार है बेटे को गले से लगाने का, लेकिन इसकी भी चिंता है कि अपना शहर, अपना देश इस संकट से पार पा ले।
उसे लगता है, मम्मी बदल गई हैंं, अब मुझे प्यार नहीं करतीं
महिला अपराध और सुरक्षा प्रकोष्ठ के साथ-साथ 112 की जिम्मेदारी संभाल रही डीसीपी शालिनी का बेटा चार साल का है। लॉकडाउन और सामाजिक दूरी के इस कठिन वक्त में एक मां की भूमिका को लेकर सवाल पर हंसते हुए कहती हैं कि 12 दिन तक बेटे के साथ मनोवैज्ञानिक शीत युद्ध चला। ड्यूटी से आकर उसे न छूना, उसे खाना खिलाना छोड़ देना, उसे गले न लगाना... और भी बहुत कुछ। उसे समझाया, वो समझ गया, लेकिन कहने लगा कि मम्मी बदल गई है, अब पहले जैसे प्यार नहीं करती है।
बच्चों की सख्त दिल मां बन गई हूं, क्या करूं
डॉ. बीनू सिंह एसपी कैंट हैं। ये इलाका हॉट स्पॉट वाले इलाकों में से एक है। तीन बच्चे हैं, जिन्हें उन्होंने दिल पर पत्थर रख कर घर निकाला दे दिया है। कहती हैं कि प्रतापगढ़ में नानी के पास भेज दिया है उन्हें। इस वक्त चुनौती है लॉकडाउन का पालन और इन हालात से उबरना। बच्चों के यहां रहने पर उनकी न तो देखभाल कर पाती, न ही उनकी चिंता से उबर पाती। हम सबकी कोशिश यही है कि शहर शांत रहे, खुशहाली लौट आए। दिनभर में बच्चों की 20-25 वीडियो कॉल आती है। कुछ ही अटेंड कर पाती हूंए उनकी शिकायत है कि उन्हें दूर कर दिया है। समझाना मुश्किल है, पर उनकी सुरक्षा जरूरी है।
एसीपी डॉ. अर्चना सिंह के पास इस वक्त प्रकोष्ठ का हिस्सा तो है, साथ ही 112 और पीआरवी की मॉनिटरिंग भी संभाल रही हैं। 13 साल की बेटी है, 4-5 साल का बेटा है। कहती हैं कि फिर भी हम पुलिस वालों के बच्चों की परवरिश ही इस तरह से होती है कि उन्हें फर्ज और परिवार के बीच की प्राथमिकताओं की समझ आ ही जाती है। घर में हूं, लेकिन मेरा कमरा सबसे अलग है। दूर से ही एक-दूसरे को देख ले रहे हैं, बस इसी बात की तसल्ली है। हां, इस दौरान बेटे ने गेट तक आकर बाय करना छोड़ दिया है।