मुठ्ठी में कुछ सपने लेकर, भरकर जेबों में आशाएं, दिल में है अरमान यही, कुछ कर जाएं, कुछ कर जाएं....। इन पंक्तियों में छिपे आत्मविश्वास का ही नतीजा है कि महिलाओं ने सबरीमाला आंदोलन, तीन तलाक जैसे मुद्दों पर जीत से लेकर चंद्रयान-2 तक का सफल ऐतिहासिक सफर पूरा किया। इसके बावजूद समानता की खातिर उन्हें अभी लंबा सफर तय करना होगा। विश्व आर्थिक मंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2234 तक ही हम कार्यस्थलों पर महिलाओं और पुरुषों में पूरी समानता को हासिल कर पाएंगे। फरवरी 2019 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे पर महिलाओं ने उल्लेखनीय प्रगति की है, इसके बावजूद कार्यस्थल पर महिलाओं-पुरुषों के बीच असमानता की खाई गहरी हो रही है। सोमवार को पूरा विश्व वर्ल्ड विमेन इक्वेलिटी डे मनाएगा, ऐसे में अमर उजाला ने समानता और असमानता के बीच के गहरे अंतर पर बात की शहर की उन महिलाओं से जिन्होंने अपना एक मुकाम बनाया है, लेकिन वे भी महसूस करती हैं कि समानता के अधिकार के लिए तय करना होगा लंबा सफर।
महिला समानता दिवसः अभी तय करना है लंबा सफर, बोलीं- पुरुषों के खाली किए गए स्पेस पर ही मिली जगह
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- डॉ. ममता यादव
हेड ऑफ डिपार्टमेंट, पॉलीटिकल साइंस, डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विवि
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हर मोर्चे पर सफल होने के बाद भी महिलाओं को लोग प्रशासनिक जिम्मेदारी वाले बड़े पद देने से डरते हैं। घर से लेकर ऑफिस तक अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही महिलाओं को समानता के हक के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है। आज भी बेटियों का बायोडाटा इसलिए स्ट्रॉन्ग किया जा रहा है ताकि उन्हें शादी में दिक्कत न हो। महिलाएं भी महज कुछ बड़े नामों को गिनाकर सशक्तीकरण के दावे कर चुप्पी साध लेती हैं जबकि हमें खुद में और अपने परिवार में कुछ उदाहरण तैयार करने चाहिए। अपनी भूमिका के लिए हमें खुद आगे आना होगा।
हर कदम पर साबित करना पड़ता है
- स्मिता वैश्य अग्रवाल
डायरेक्टर, सीएफओ, पीटीसी इंडस्ट्रीज लि.
महिलाओं को अतिरिक्त कोशिशें करनी ही पड़ती हैं। हमारी फैक्ट्री में कुछ समय पहले तक लड़कियां डेस्क वर्क तक सीमित थीं, लेकिन अब वे इंजीनियर बनकर फैक्ट्री के अंदर काम करने की इच्छा लेकर आती हैं। यह बदलाव उम्मीद जताता है। हालांकि यह उनके उत्साह से ही संभव है। सोसाइटी आज भी यह मानती हैं या यूं कहिए आशंकित रहती है कि ये काम एक लड़की या महिला कर पाएगी या नहीं। चूंकि वे घर भी संभालती हैं, इसलिए उनको जिम्मेदारी देने से कतराते हैं लोग, पर समानता की ओर हम बढ़ चले हैं, इसलिए चिंता की बात नहीं।
एक तबका झेल रहा है भेदभाव
- रीना भार्गव, चार्टर्ड अकाउंटेंट
मेरी प्रोफेशनल जर्नी को 30 साल हो गए। जिस दौर में मैंने सीए बनने का फैसला लिया, उस वक्त लड़कियों के लिए यह एक चुनौती थी। धीरे-धीरे तस्वीर बदली और अब लड़कियां सीए बनने का सपना देखती हैं और उसे पूरा करती हैं। जब आप खुद अपने बॉस होते हैं तो भेदभाव की गुंजाइश कम होती है, लेकिन यदि आप नौकरीपेशा महिला हैं तो कार्यस्थल पर समानता की लड़ाई आपको लड़नी ही पड़ेगी। यह कड़वा सच है। फिर भी तस्वीर के दो रुख हैं, हमें सकारात्मक पक्ष को देखना होगा और अपने हक, अपने स्थान को छीनना होगा।
पुरुषों के खाली किए गए स्पेस पर ही मिली जगह
- वीना राना, सोशल वर्कर, दस्तक
संसद में सिर्फ 78 महिलाएं हैं यानी महज 17 प्रतिशत। यह महिलाओं के साथ असमानता का सबसे बड़ा उदाहरण है। अर्थव्यवस्था और वेतन में महिलाओं की भागीदारी में भारत चीन और बांग्लादेश से भी पीछे है। हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर, हर कदम पर खुद को साबित कर रही महिलाओं को हमारा समाज अभी भी समान दर्जा देने में हिचकते हैं। राजधानी व आसपास के इलाकों में चले जाइए, आज भी प्रधान पति ही सक्रिय हैं। मेरे हिसाब से जो हम देख रहे हैं कि महिलाएं आगे आ रही हैं, लेकिन असल में वे पुरुषों के खाली किए गए स्पेस पर ही पहुंच पाती हैं।