ग्राउंड रिपोर्ट: मुश्किल में जिंदगी, किसी ने पत्नी का मंगलसूत्र बेचा तो कोई बच्चों के साथ धूप में पैदल चला
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बीच रास्ते में छोड़कर भाग गया ड्राइवर
पिता जी ने नाराज होकर घर से भगा दिया तो राजस्थान चला गया। वहां खेलकूद का सामान बनाने वाली फैक्टरी में काम करने लगा। लेकिन लॉकडाउन में सब खत्म हो गया। इसलिए घर लौटना था। पैसा था नहीं तो मां से मिली सोने की करधनी बेच दी। इससे 4000 हजार रुपये मिले। इसके बाद पैदल ही घर चल पड़ा। करीब सौ किमी पैदल चलने व दो सौ किमी डाला से सफर के बाद एक तवेरा गाड़ी में बैठा। ड्राइवर ने घर तक पहुंचाने के लिए पूरे 4000 रुपये वसूल लिए। जब गाड़ी लखनऊ के लिए मुड़ी तो खाने के लाले पड़ गए। पीने को पानी तक नहीं मिला। आज सुबह आगरा एक्सप्रेस वे के टोल प्लाजा से पहले ड्राइवर ने कमानी में गड़बड़ी की बात कह गाड़ी रोक दी और हमें नीचे उतार कर बोला कि कमानी बनवाकर आता हूं। उसके इंतजार में दोपहर हो गई, लेकिन वह लौटा नहीं।
धूप से बचाने को आंचल में समेटे रही
सुशीला ने बताया कि पति दिल्ली में नौकरी करते थे। हाल ही में हमें साथ रहने बुलाया था। कोरोना से पति की नौकरी चली गई। एक दिन पैदल ही बच्चों को लेकर निकल पड़ीं। धूप से बचाने के लिए उन्हें गोद में लिए करीब 30 किमी की यात्रा भी कर ली। लेकिन फिर बस मिल गई। वहां से जैसे-तैसे लखनऊ पहुंची। अब यहां से उन्नाव के लिए बस का इंतजार है।
पत्नी का मंगलसूत्र बेच चुकाया टैक्सी का किराया
आठ साल पहले मुजफ्फरपुर से काम की तलाश में राजस्थान गया था। पिता बुजुर्ग थे और भाइयों ने किनारा कर लिया था। एक बहन की शादी व परिवार के खर्च का जिम्मा मुझ पर आ गया। मेरी बीवी व एक बेटी है। जयपुर में एक निजी कंपनी में 7000 रुपये की नौकरी मिल गई। धीरे-धीरे सब ठीक हो रहा था। सैलरी भी बढ़कर 13000 हो गई थी। लेकिन 46 दिन के लॉकडाउन में सारी जमापूंजी खत्म हो गई। वापसी के लिए रुपये तक नहीं बचे। बीवी को फोन बताया तो उसने मंगलसूत्र बेचकर 17,000 रुपये खाते में डलवाए। इसके बाद दोस्तों के साथ टैक्सी बुक की और घर निकल पड़ा।
दो दिन बाद मिलीं पूड़ियां, तब आया सुकून
राजकुमार ने बताया कि बाराबंकी में मजदूरी करता था। वहां से पैदल ही परिवार के साथ लखनऊ तक आ गया। रास्ते में खाने को कहीं मिला ही नहीं। दो दिन हो गए थे। लखनऊ में खाने के पैकट मिले। अब झांसी के आगे दतिया जाना है। बस के इंतजार में बैठा हूं। कुछ लोगों ने बताया शकुंतला मिश्रा विवि चले जाओ तो यहां चला आया। अब अधिकारी कुछ भी बताने को तैयार नहीं। कहते हैं, बस चलाएंगे, जब संख्या हो जाएगी।