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Lucknow News: बाल संरक्षण राज्य व समाज की जिम्मेदारी, न बरती जाए लापरवाही
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बाल संरक्षण राज्य व समाज की जिम्मेदारी, न बरती जाए लापरवाही
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किशोर न्याय अधिनियम के दस वर्ष पूरे होने पर राज्य स्तरीय परामर्श
लखनऊ। किशोर न्याय अधिनियम के दस वर्ष पूरे होने पर गत दिवस गोमतीनगर स्थित न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान जेटीआरआई में राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें बाल संरक्षण को राज्य व समाज की जिम्मेदारी बताया गया। कार्यक्रम उच्च न्यायालय किशोर न्याय समिति ने महिला एवं बाल विकास विभाग तथा यूनिसेफ के सहयोग से आयोजित करवाया।
कार्यक्रम में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली ने बाल संरक्षण को राज्य व समाज की जिम्मेदारी बताया। उन्होंने अधिनियम द्वारा बच्चों के सर्वोत्तम हित, गरिमा और पुनर्वास को दिए गए महत्व पर जोर दिया। किशोर न्याय बोर्डों, बाल कल्याण समितियों व डिजिटल दत्तक ग्रहण प्रक्रियाओं में हुई प्रगति का उल्लेख किया। न्यायाधीश राजन रॉय ने भारत में किशोर न्याय व्यवस्था के विकास को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि किशोर न्याय की सफलता का आकलन बच्चों के संरक्षण व पुनर्वास से होना चाहिए। न्यायाधीश अजय भनोट ने जमानत और बाल संरक्षण मामलों में बाल-संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मां के कारावास के कारण बच्चे को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव लीना जौहरी ने बाल संरक्षण में एक दशक के सुधारों पर बात की। उन्होंने बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत करने पर बल दिया। कार्यक्रम के दौरान 'उड़ान' पुस्तक के तीसरे संस्करण का विमोचन किया गया। परामर्श सत्रों में उत्तर प्रदेश के जिला न्यायाधीश, विशेष न्यायाधीश(पॉक्सो) व किशोर न्याय बोर्डों के प्रधान मजिस्ट्रेट सहित कई हितधारकों ने भाग लिया।
लखनऊ। किशोर न्याय अधिनियम के दस वर्ष पूरे होने पर गत दिवस गोमतीनगर स्थित न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान जेटीआरआई में राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें बाल संरक्षण को राज्य व समाज की जिम्मेदारी बताया गया। कार्यक्रम उच्च न्यायालय किशोर न्याय समिति ने महिला एवं बाल विकास विभाग तथा यूनिसेफ के सहयोग से आयोजित करवाया।
कार्यक्रम में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली ने बाल संरक्षण को राज्य व समाज की जिम्मेदारी बताया। उन्होंने अधिनियम द्वारा बच्चों के सर्वोत्तम हित, गरिमा और पुनर्वास को दिए गए महत्व पर जोर दिया। किशोर न्याय बोर्डों, बाल कल्याण समितियों व डिजिटल दत्तक ग्रहण प्रक्रियाओं में हुई प्रगति का उल्लेख किया। न्यायाधीश राजन रॉय ने भारत में किशोर न्याय व्यवस्था के विकास को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि किशोर न्याय की सफलता का आकलन बच्चों के संरक्षण व पुनर्वास से होना चाहिए। न्यायाधीश अजय भनोट ने जमानत और बाल संरक्षण मामलों में बाल-संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मां के कारावास के कारण बच्चे को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव लीना जौहरी ने बाल संरक्षण में एक दशक के सुधारों पर बात की। उन्होंने बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत करने पर बल दिया। कार्यक्रम के दौरान 'उड़ान' पुस्तक के तीसरे संस्करण का विमोचन किया गया। परामर्श सत्रों में उत्तर प्रदेश के जिला न्यायाधीश, विशेष न्यायाधीश(पॉक्सो) व किशोर न्याय बोर्डों के प्रधान मजिस्ट्रेट सहित कई हितधारकों ने भाग लिया।
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